खाड़ी क्षेत्र में 'पावर गेम' का अंत: ईरान ने ढहाया अमेरिका का सैन्य साम्राज्य
ईरान के हमलों ने खाड़ी में अमेरिका के 12 सैन्य बेस किए तबाह। 40 दिन की जंग में सुरक्षा ढांचा पूरी तरह पंगु
दुबई/तेहरान। मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) के रणक्षेत्र से जो खबरें निकलकर सामने आ रही हैं, उन्होंने वैश्विक शक्ति संतुलन को हिलाकर रख दिया है। कभी दुनिया का सबसे शक्तिशाली सैन्य नेटवर्क माना जाने वाला अमेरिकी ढांचा आज ईरान के सटीक हमलों के सामने 'ताश के पत्तों' की तरह ढहता नजर आ रहा है। पिछले 40 दिनों से जारी भीषण संघर्ष ने यह साबित कर दिया है कि खाड़ी के अरब देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने अब अमेरिका की ताकत नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन चुके हैं।
विदेशी रक्षा विशेषज्ञों और न्यूज़ रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के जवाबी हमलों ने सऊदी अरब, यूएई (UAE), कतर और बहरीन जैसे देशों में स्थित कम से कम 12 अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया है। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कई महत्वपूर्ण एयरबेस अब विमानों के टेक-ऑफ और लैंडिंग के लायक भी नहीं बचे हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि ट्रंप प्रशासन ने अभी तक नुकसान के वास्तविक आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया है, जिसे विशेषज्ञ एक 'रणनीतिक चुप्पी' मान रहे हैं।
जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के मिडिल ईस्ट पॉलिटिक्स प्रोजेक्ट के डायरेक्टर के अनुसार, यह अमेरिका की उस सैन्य संरचना का अंत है जिसे 1990 के खाड़ी युद्ध के बाद दशकों की मेहनत और अरबों डॉलर खर्च करके बनाया गया था। अमेरिका ने इस क्षेत्र में लगभग 19 बड़े सैन्य ठिकाने बनाए थे, जहाँ 50,000 से अधिक सैनिक तैनात रहते थे। इस नेटवर्क का मकसद खाड़ी देशों को सुरक्षा देना और बदले में तेल एवं रणनीतिक नियंत्रण हासिल करना था। लेकिन ईरान ने मात्र एक महीने के भीतर इस पूरे स्ट्रक्चर को 'पंगु' बना दिया है।
दिलचस्प बात यह है कि जिन देशों में ये बेस मौजूद हैं—जैसे बहरीन, कुवैत और कतर—वहां इन ठिकानों तक पहुंच को पूरी तरह से सीमित कर दिया गया है। जंग के दौरान इन देशों ने अपने आसमान में उड़ती मिसाइलों की रिकॉर्डिंग और तस्वीरों पर भी कड़ा प्रतिबंध लगा दिया था। जानकारों का मानना है कि अरब देश नहीं चाहते कि उनके क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सुरक्षा तंत्र की पोल खुले, जो अब खुद अपनी सुरक्षा करने में नाकाम साबित हो रहा है।
मिडिल ईस्ट आई की रिपोर्ट संकेत देती है कि जो तस्वीरें दिखाई दे रही हैं, असली तबाही उससे कहीं ज्यादा बड़ी है। ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों ने न केवल रडार सिस्टम को चकमा दिया, बल्कि कमांड एंड कंट्रोल सेंटर्स को भी सीधा निशाना बनाया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब अमेरिका के पास दो ही विकल्प बचे हैं: या तो वह भारी निवेश के साथ इन ठिकानों को फिर से खड़ा करे, या फिर इस क्षेत्र से अपनी सैन्य मौजूदगी को हमेशा के लिए समेट ले।
40 दिनों की इस छोटी सी अवधि ने यह स्पष्ट कर दिया है कि युद्ध की नई तकनीक और ईरान की सटीक मिसाइल क्षमता ने पुराने जमाने के पारंपरिक सैन्य ठिकानों की प्रासंगिकता खत्म कर दी है। मध्य पूर्व अब एक ऐसे मोड़ पर है जहां अमेरिका का 'छत्रप' डगमगा रहा है और क्षेत्रीय ताकतें अपनी शर्तों पर नया भूगोल लिखने को तैयार हैं।
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