युवाओं में तेजी से बढ़ रहा है 'डिमेंशिया', क्या आप भी भूल रहे हैं अपनों के नाम ?
युवाओं में बढ़ते डिमेंशिया के लक्षण, कारण और बचाव पर विशेष रिपोर्ट। जानें क्यों 30 की उम्र में खो रही है याददाश्त।
आज के आधुनिक युग में जहाँ तकनीक और सुख-सुविधाएं हमारे करीब आई हैं, वहीं मानसिक बीमारियों ने भी खामोशी से हमारे जीवन में सेंध लगा दी है। कभी बुढ़ापे की पहचान मानी जाने वाली 'भूलने की बीमारी' यानी डिमेंशिया (Dementia) अब युवाओं को अपना शिकार बना रही है। उत्तर प्रदेश के मेरठ स्थित लाला लाजपत राय स्मारक मेडिकल कॉलेज के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। यहाँ की मानसिक रोग विभाग की ओपीडी में आने वाला हर छठा व्यक्ति डिमेंशिया की गिरफ्त में पाया जा रहा है।
क्या है डिमेंशिया? यह केवल 'भूलना' नहीं है
मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञ डॉ. तरुणपाल के अनुसार, लोग अक्सर डिमेंशिया को सामान्य भूलने की आदत समझ लेते हैं, लेकिन यह उससे कहीं अधिक गंभीर है। यह मस्तिष्क की उन कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने की स्थिति है जो हमारी याददाश्त, निर्णय लेने की क्षमता और व्यवहार को नियंत्रित करती हैं।
इसकी शुरुआत बहुत मामूली होती है—जैसे चाबी रखकर भूल जाना या किसी परिचित का नाम याद न आना। लेकिन धीरे-धीरे यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि व्यक्ति यह भी भूल जाता है कि उसने कुछ समय पहले भोजन किया था या नहीं। अंततः, मरीज अपने ही परिवार के सदस्यों को पहचानने में असमर्थ हो जाता है।
चिंताजनक रुझान: 30 की उम्र में 'अर्ली डिमेंशिया'
डॉ. तरुणपाल बताते हैं कि पहले यह बीमारी 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में देखी जाती थी। लेकिन अब ओपीडी में 30 से 40 वर्ष के युवा बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। इसे 'अर्ली ऑनसेट डिमेंशिया' कहा जाता है। इसके मुख्य कारणों में अत्यधिक मानसिक दबाव, नींद की कमी और असंतुलित जीवनशैली शामिल है।
"विडंबना यह है कि पीड़ित व्यक्ति अक्सर अपनी बीमारी को स्वीकार नहीं करता, जिससे इलाज में देरी होती है।" - डॉ. तरुणपाल
प्रमुख लक्षण: कब हो जाएं सावधान?
डिमेंशिया के लक्षण अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे उभरते हैं। यदि आप या आपके आसपास कोई नीचे दिए गए लक्षणों का अनुभव कर रहा है, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना अनिवार्य है:
- हाल की घटनाओं को भूलना: पुरानी बातें याद रहना लेकिन 10 मिनट पहले की बात भूल जाना।
- व्यवहार में परिवर्तन: अचानक गुस्सा आना, चिड़चिड़ापन या बिना कारण रोना।
- भ्रम की स्थिति: परिचित रास्तों को भूल जाना या अपनों के चेहरे न पहचान पाना।
- एकाग्रता में कमी: एक ही सवाल को बार-बार दोहराना।
- डर और घबराहट: बिना किसी ठोस वजह के असुरक्षित महसूस करना।
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क्यों बढ़ रहा है यह खतरा? साइकोलॉजिस्ट की राय
प्रसिद्ध साइकोलॉजिस्ट सोनी जैन के अनुसार, डिमेंशिया के प्रसार के पीछे शारीरिक से ज्यादा मानसिक और जीवनशैली से जुड़े कारण जिम्मेदार हैं:
- क्रोनिक स्ट्रेस और बर्नआउट: लगातार काम का दबाव और मानसिक थकान मस्तिष्क की कार्यक्षमता को कम कर देती है।
- डिजिटल एडिक्शन: मोबाइल और टीवी में अत्यधिक समय बिताने से मस्तिष्क का वह हिस्सा सुस्त हो जाता है जो यादें संजोता है।
- नींद की कमी: मस्तिष्क को खुद को रिपेयर करने के लिए कम से कम 7-8 घंटे की गहरी नींद चाहिए, जिसकी कमी युवाओं में आम है।
- नशीले पदार्थ: शराब और धूम्रपान का सेवन मस्तिष्क की नसों को स्थायी नुकसान पहुंचाता है।
- शारीरिक बीमारियां: हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और सिर में पुरानी चोट भी इसके खतरे को कई गुना बढ़ा देती है।
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देखभाल और व्यवहार: परिजनों के लिए मार्गदर्शिका
डिमेंशिया का मरीज एक ऐसे संसार में होता है जहाँ सब कुछ धुंधला है। ऐसे में परिवार का सहयोग ही उनकी सबसे बड़ी दवा है।
- धैर्य रखें: उनसे बात करते समय छोटे और सरल वाक्यों का प्रयोग करें।
- पहचान बनाए रखें: उन्हें बार-बार दिन, तारीख और समय की याद दिलाते रहें।
- सुविधाजनक वातावरण: उनके कमरे में पर्याप्त रोशनी हो और बाथरूम पास हो ताकि उन्हें भ्रम न हो।
- सम्मान दें: उनके साथ बच्चों जैसा व्यवहार न करें, बल्कि उन्हें नाम लेकर पुकारें और उनकी गरिमा का ध्यान रखें।
बचाव के उपाय: कैसे रखें दिमाग को युवा?
यद्यपि डिमेंशिया का कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन सही समय पर दवाओं और जीवनशैली में बदलाव से इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
- मानसिक कसरत: किताबें पढ़ें, पहेलियां सुलझाएं या नई भाषा सीखें। दिमाग जितना सक्रिय रहेगा, उतना ही सुरक्षित रहेगा।
- स्वस्थ आहार: ओमेगा-3 फैटी एसिड और एंटीऑक्सीडेंट युक्त भोजन लें।
- योग और व्यायाम: नियमित शारीरिक गतिविधि मस्तिष्क में रक्त के संचार को बेहतर बनाती है।
- सोशल रहें: अकेलेपन से बचें, दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताएं।
मानसिक स्वास्थ्य कोई शर्म का विषय नहीं है। यदि आप या आपका कोई प्रियजन भूलने की समस्या से जूझ रहा है, तो इसे 'काम का तनाव' समझकर नजरअंदाज न करें। समय पर लिया गया डॉक्टरी परामर्श न केवल याददाश्त बचा सकता है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को भी बेहतर बना सकता है। याद रखिए, स्वस्थ दिमाग ही खुशहाल जीवन की नींव है।
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