कानपुर: हीमोफिलिया को मात देने के लिए सही प्रबंधन जरूरी; विशेषज्ञों ने साझा किए जीवन रक्षक सुझाव
कानपुर में हीमोफिलिया सोसाइटी ने संगोष्ठी का आयोजन कर इस लाइलाज आनुवंशिक बीमारी के लक्षणों और प्रबंधन पर विस्तृत चर्चा की।
कानपुर: हीमोफिलिया सोसाइटी, कानपुर के तत्वावधान में रविवार को एक विशेष जागरूकता संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ सोसाइटी के संरक्षक प्रवीण सेठ, सचिव राजेश भसीन और कोषाध्यक्ष डॉ. सुनील तनेजा ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया। इस दौरान शहर के सुप्रसिद्ध चिकित्सा विशेषज्ञों ने हीमोफिलिया जैसी गंभीर और आनुवंशिक बीमारी पर अपने विचार साझा किए।
क्या है हीमोफिलिया? विशेषज्ञों की राय
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए डॉ. सुनील तनेजा ने बताया कि हीमोफिलिया एक आनुवंशिक विकार (Genetic Disorder) है, जिसमें शरीर की रक्त का थक्का (Blood Clot) बनाने की क्षमता बेहद कम हो जाती है। सामान्य स्थिति में चोट लगने पर रक्त का 'जाल' बनकर खून रुक जाता है, लेकिन हीमोफिलिया के रोगियों में यह प्रक्रिया धीमी होने के कारण अत्यधिक रक्तस्राव का खतरा बना रहता है।
बीमारी के प्रकार और मुख्य लक्षण
- डॉक्टरों ने बताया कि यह बीमारी मुख्य रूप से 'क्लॉटिंग फैक्टर' नामक प्रोटीन की कमी से होती है, जिसके दो मुख्य प्रकार हैं:
- हीमोफिलिया A: इसमें 'फैक्टर 8' की कमी होती है, जो सबसे अधिक पाया जाने वाला प्रकार है।
- हीमोफिलिया B: इसमें 'फैक्टर 9' की कमी के कारण समस्या उत्पन्न होती है।
सावधान रहने योग्य लक्षण:
- चोट लगने पर लंबे समय तक रक्त का बहना।
- बिना किसी कारण के अचानक नाक से खून आना।
- जोड़ों (घुटनों, कोहनियों) में सूजन और तीव्र दर्द, जो आंतरिक रक्तस्राव का संकेत है।
- त्वचा पर गहरे नीले निशान पड़ना।
इलाज और प्रबंधन
विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि हालांकि यह बीमारी अभी तक लाइलाज है, लेकिन 'फैक्टर रिप्लेसमेंट थेरेपी' के जरिए इसे प्रभावी ढंग से मैनेज किया जा सकता है। इसमें मरीज को इंजेक्शन के माध्यम से वह क्लॉटिंग फैक्टर दिया जाता है जिसकी उसके शरीर में कमी होती है।
इस अवसर पर डॉ. अवध दुबे, डॉ. संजय रस्तोगी, डॉ. बी. एन. त्रिपाठी, डॉ. ए. के. आर्य, और डॉ. एस. के. गौतम सहित सोसाइटी के कई पदाधिकारी और चिकित्सा जगत से जुड़े लोग उपस्थित रहे।
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