यूपी के एक्सपोर्टर्स पर दोहरी मार: पहले अमेरिकी 'टैरिफ वार' ने झुलसाया, अब मिडिल ईस्ट के 'बारूद' ने बिगाड़ा अरबों का गणित
अमेरिकी टैरिफ और अब मिडिल ईस्ट संकट ने उत्तर प्रदेश के निर्यातकों की कमर तोड़ दी है, जिससे अरबों के ऑर्डर ठप हैं।
कानपुर/प्रयागराज। उत्तर प्रदेश की औद्योगिक राजधानी कानपुर समेत पूरे प्रदेश के निर्यातकों के लिए साल 2025-26 किसी 'आर्थिक दुःस्वप्न' से कम साबित नहीं हो रहा है। अभी उत्तर प्रदेश के कारोबारी अमेरिका द्वारा थोपे गए भारी-भरकम टैरिफ की मार से उबरने की कोशिश ही कर रहे थे कि मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में भड़की युद्ध की चिंगारी ने भारतीय निर्यात के पहियों को जाम कर दिया है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने न केवल समुद्री रास्तों को असुरक्षित कर दिया है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की सप्लाई चेन को भी छिन्न-भिन्न कर दिया है।
अमेरिकी टैरिफ का दंश और अस्थायी राहत
भारतीय निर्यातकों, विशेषकर उत्तर प्रदेश के लेदर, टेक्सटाइल और हस्तशिल्प व्यापारियों के लिए चुनौतियों का सिलसिला जुलाई 2025 से शुरू हुआ था। उस समय अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर टैरिफ की दरें बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दी थीं। इस कदम ने अमेरिका को होने वाले निर्यात को लगभग ठप कर दिया था। हालांकि, कूटनीतिक प्रयासों के बाद 6 फरवरी 2026 को जब इन दरों को घटाकर 18 प्रतिशत किया गया, तो निर्यातकों के चेहरे पर मुस्कान लौटी थी। लेकिन यह राहत क्षणभंगुर साबित हुई।
मिडिल ईस्ट वॉर: एक नया वैश्विक संकट
जैसे ही निर्यातकों ने अपने पुराने ऑर्डर्स को गति देनी शुरू की, 28 फरवरी 2026 से मिडिल ईस्ट में शुरू हुए सैन्य संघर्ष ने पूरी स्थिति उलट दी। मौजूदा हालात यह हैं कि जिस अमेरिका ने दरें कम की थीं, उसी की संलिप्तता और क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण गल्फ कॉर्पोरेशन काउंसिल (GCC) के सदस्य देशों के साथ भारत का व्यापार पूरी तरह ठंडा पड़ चुका है।
कानपुर के चमड़ा उद्योग और नोएडा के गारमेंट सेक्टर के हजारों करोड़ रुपये के ऑर्डर वर्तमान में 'होल्ड' पर हैं। विदेशी बायर्स ने या तो संपर्क तोड़ लिया है या वे नए शिपमेंट लेने से कतरा रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता समुद्री रास्तों (Red Sea) को लेकर है, जहाँ जहाजों पर हमलों के डर से माल ढुलाई का बीमा और भाड़ा कई गुना बढ़ गया है।
आंकड़ों की जुबानी: गिरता ग्राफ
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (FIEO) के सहायक निदेशक आलोक श्रीवास्तव के अनुसार, "वर्ष 2024-25 में उत्तर प्रदेश का कुल निर्यात लगभग 1 लाख 86 हजार करोड़ रुपये रहा था, जिसमें अकेले अमेरिका की हिस्सेदारी 19 प्रतिशत थी। हमें उम्मीद थी कि 2026 में हम इस रिकॉर्ड को तोड़ेंगे, लेकिन जुलाई से दिसंबर 2025 के झटके और अब मिडिल ईस्ट वॉर ने हमारे पूरे गणित को बिगाड़ दिया है। इस सत्र में निर्यात के आंकड़ों में बड़ी गिरावट दर्ज की जा सकती है।"
विशेषज्ञों की राय: धैर्य और विकल्प की तलाश
काउंसिल फॉर लेदर एक्सपोर्ट (CLE) के पूर्व चेयरमैन मुख्तारुल अमीन ने वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि निर्यातक केवल युद्ध थमने का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि जहाँ सीधे तौर पर युद्ध का असर है, उन देशों को छोड़कर अन्य संभावित बाजारों में बायर्स से संपर्क साधा जा रहा है ताकि नुकसान की भरपाई की जा सके।
वहीं, CLE के क्षेत्रीय अध्यक्ष असद इराकी ने निर्यातकों को ढांढस बंधाते हुए कहा, "यह दौर कठिन है, लेकिन हमें अपनी उत्पादन क्षमता और गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए। जैसे ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति बहाली की प्रक्रिया शुरू होगी, भारतीय उत्पादों की मांग फिर से बढ़ेगी। अभी हौसला रखने और अपने स्टॉक को तैयार रखने का समय है।"
निष्कर्ष: उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर असर
उत्तर प्रदेश सरकार ने 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' (ODOP) के माध्यम से निर्यात को बढ़ाने का जो लक्ष्य रखा था, उस पर वैश्विक अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। यदि मिडिल ईस्ट का संकट लंबा खिंचता है, तो इसका असर केवल निर्यातकों की जेब पर नहीं, बल्कि उन लाखों कारीगरों और श्रमिकों पर भी पड़ेगा जो इन उद्योगों से सीधे तौर पर जुड़े हैं। फिलहाल, भारतीय निर्यातक सरकार से लॉजिस्टिक्स और शिपिंग में रियायत की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0