हिमाचल का हर दूसरा किशोर डिप्रेशन का शिकार, 5% के मन में खुदकुशी का विचार

हिमाचल के 53% किशोर डिप्रेशन की चपेट में। PGI चंडीगढ़ के सर्वे में सोशल मीडिया और अकेलेपन के घातक खुलासे

May 3, 2026 - 13:04
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हिमाचल का हर दूसरा किशोर डिप्रेशन का शिकार, 5% के मन में खुदकुशी का विचार

शिमला: जिसे हम 'देवभूमि' के शांत पहाड़ों और स्वच्छ हवा के लिए जानते हैं, वहां की भावी पीढ़ी के भीतर एक खामोश तूफान पनप रहा है। हिमाचल प्रदेश के युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जिसने अभिभावकों, शिक्षकों और सरकार की नींद उड़ा दी है। पीजीआई (PGI) चंडीगढ़ और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के एक संयुक्त सर्वे में खुलासा हुआ है कि प्रदेश के 53 प्रतिशत किशोर अवसाद (Depression) के गहरे जाल में फंसे हैं।

कैनवस के रंगों से 'फिल्टर' की दुनिया तक: सान्या की कहानी
जिला कांगड़ा की 16 वर्षीय सान्या (नाम परिवर्तित) कभी अपनी पेंटिंग्स के लिए जानी जाती थी। लेकिन पिछले छह महीनों से उसके कैनवस सफेद पड़े हैं। सान्या अब 'बॉडी डिस्मोर्फिया' का शिकार है। वह घंटों अपनी फोटो एडिट करती है और अगर सोशल मीडिया पर 'लाइक्स' कम मिलें, तो खाना छोड़ देती है। सान्या अकेली नहीं है; हिमाचल के हजारों किशोर आज 'डिजिटल वैलिडेशन' के इस खतरनाक चक्रव्यूह में अपनी असली पहचान खो रहे हैं।

सर्वे के चौंकाने वाले आंकड़े: रील बनाम रीयल की जंग

पीजीआई चंडीगढ़ के डिपार्टमेंट ऑफ साइकियाट्री के विशेषज्ञों, डॉ. संदीप ग्रोवर और डॉ. सुभो चक्रवर्ती के नेतृत्व में 11,000 बच्चों पर किए गए इस अध्ययन ने कई कड़वी सच्चाइयां उजागर की हैं। शिमला, मंडी, धर्मशाला और सोलन जैसे प्रमुख जिलों के 13 से 19 आयु वर्ग के बच्चों पर हुए इस शोध के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • 53% किशोर: किसी न किसी स्तर के अवसाद (Depression) से जूझ रहे हैं।
  • 14% किशोर: क्लिनिकल डिप्रेशन के गंभीर स्तर पर हैं, जिन्हें तत्काल चिकित्सा की आवश्यकता है।
  • 5% सुसाइडल टेंडेंसी: हर 100 में से 5 बच्चे अपने जीवन को समाप्त करने के बारे में सोच रहे हैं।
  • 14% एंग्जायटी: किशोरों में घबराहट और व्यवहार संबंधी विकार तेजी से बढ़ रहे हैं।

क्यों 'बीमार' हो रहा है बचपन? विशेषज्ञों का विश्लेषण
डॉ. संदीप ग्रोवर के अनुसार, किशोरावस्था में मस्तिष्क का 'प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स' पूरी तरह विकसित नहीं होता, जो सही निर्णय लेने में मदद करता है। ऐसे में इंटरनेट पर दूसरों की "परफेक्ट लाइफ" देखकर बच्चे हीन भावना का शिकार हो रहे हैं।

  • सोशल मीडिया की छद्म दुनिया: बच्चे रील लाइफ की चमक-धमक को हकीकत मान लेते हैं। जब उनका अपना जीवन वैसा नहीं दिखता, तो वे खुद को 'फेलियर' मानने लगते हैं।
  • नींद की कमी (Melatonin Imbalance): देर रात तक स्मार्टफोन का इस्तेमाल 'मेलाटोनिन' हार्मोन के संतुलन को बिगाड़ रहा है, जिससे चिड़चिड़ापन और तनाव बढ़ रहा है।
  • अकेलापन और कामकाजी माता-पिता: परमाणु परिवारों (Nuclear Families) के बढ़ते चलन और माता-पिता की व्यस्तता के कारण बच्चों को भावनात्मक सहारा नहीं मिल पा रहा है। मंडी के एक छात्र ने अकेलेपन से बचने के लिए नशे का सहारा तक ले लिया।
  • एकेडमिक बर्नआउट: जेईई (JEE) और मेडिकल जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ रहा है। 17 वर्षीय आयान जैसे मेधावी छात्र 'पैनिक अटैक' का शिकार हो रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि 'असफलता' का मतलब जीवन का अंत है।

ऑनलाइन गेमिंग: एक नया नशा
रिपोर्ट के अनुसार, ऑनलाइन गेमिंग की लत बच्चों को समाज से काट रही है। खेल में हारने या गेम न खेलने देने पर बच्चे हिंसक व्यवहार कर रहे हैं। अंधेरे कमरे में बंद होकर घंटों स्क्रीन पर बिताना अब एक सामान्य व्यवहार नहीं, बल्कि गंभीर अवसाद का लक्षण बन चुका है।

उम्मीद की किरण: 'नई दिशा' केंद्र
चिंताजनक आंकड़ों के बीच एक सकारात्मक पहलू यह है कि हिमाचल सरकार ने 103 'नई दिशा केंद्र' स्थापित किए हैं। स्वास्थ्य सचिव एम. सुधा के अनुसार, अब किशोर खुद इन केंद्रों पर आकर अपनी व्यथा सुना रहे हैं। यह 'हेल्प सीकिंग बिहेवियर' (मदद मांगने की प्रवृत्ति) बदलाव की पहली सीढ़ी है।

अभिभावकों के लिए 'अलार्म कॉल': क्या करें?
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मानसिक बीमारी कोई 'टैबू' (कलंक) नहीं है। यदि आपका बच्चा चुपचाप रहने लगा है, उसकी हॉबी छूट गई है या नींद में बदलाव आया है, तो:

  • संवाद करें, उपदेश न दें: बच्चे को बोलने का मौका दें, उसकी बात काटें नहीं।
  • डिजिटल डिटॉक्स: दिन में कम से कम 30-40 मिनट बिना मोबाइल के परिवार के साथ बिताएं।
  • तुलना बंद करें: हर बच्चा अपने आप में अनूठा है; उसे दूसरों के मार्क्स के तराजू में न तौलें।
  • विशेषज्ञ की सलाह: यदि स्थिति नियंत्रण से बाहर लगे, तो मनोचिकित्सक से मिलने में संकोच न करें।
  • हिमाचल के इन मासूमों को आज 'लाइक' और 'शेयर' की नहीं, बल्कि अपनों के 'साथ' और 'समझ' की जरूरत है।
  • (etv)

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