विशेष रिपोर्ट: अमेरिका का 'ऑयल चक्रव्यूह' – कैसे एक तीर से ढेर हुए चीन और रूस?
अमेरिका ने एनर्जी डोमिनेंस नीति से चीन का सस्ता तेल बंद कर रूस और चीन को आर्थिक संकट में डाल दिया है
नई दिल्ली/वॉशिंगटन : दुनिया जिसे ईरान और अमेरिका के बीच एक क्षेत्रीय तनाव समझ रही है, वह असल में वैश्विक अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े 'पावर गेम' का हिस्सा है। पिछले कुछ समय में अमेरिका ने अपनी 'एनर्जी डोमिनेंस' (ऊर्जा प्रभुत्व) की नीति के तहत कुछ ऐसी चालें चली हैं, जिसने एक साथ चीन की विकास दर और रूस की वित्तीय ताकत को बैकफुट पर धकेल दिया है। इस पूरी बिसात में ईरान तो महज एक जरिया है, असली मकसद तो उन कड़ियों को तोड़ना था जो चीन और रूस को वैश्विक तेल बाजार में मजबूत बना रही थीं।
डिस्काउंट तेल के खेल का अंत
चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। उसकी पूरी औद्योगिक ताकत इसी कच्चे तेल की सस्ती आपूर्ति पर टिकी है। ईरान और वेनेजुएला जैसे देशों पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों का चीन ने भरपूर फायदा उठाया। वह इन देशों से आधिकारिक बाजार मूल्य की तुलना में $8 से $15 प्रति बैरल तक के भारी डिस्काउंट पर तेल खरीद रहा था। लेकिन अब अमेरिका ने इस खेल को पूरी तरह बिगाड़ दिया है।
अमेरिका ने न केवल प्रतिबंधों को कड़ा किया, बल्कि उन 'घोस्ट टैंकरों' (गुप्त जहाजों) को ट्रैक करना और जब्त करना शुरू कर दिया है, जो अवैध रूप से चीन तक तेल पहुँचाते थे। इससे चीन के लिए अब सस्ता तेल खरीदना न केवल महंगा हो गया है, बल्कि एक बड़ा जोखिम भी बन गया है।
चीन की सप्लाई लाइन पर प्रहार
चीन अपनी तेल की कुल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा ईरान और वेनेजुएला जैसे प्रतिबंधित देशों से प्राप्त करता था। अमेरिका ने अब होर्मुज जलडमरूमध्य और खार्ग द्वीप जैसे रणनीतिक इलाकों पर दबाव बनाकर चीन की मुख्य सप्लाई लाइन को असुरक्षित बना दिया है। जब ये सस्ते विकल्प बंद होते हैं, तो चीन को मजबूरन सऊदी अरब या सीधे अमेरिका से बाजार भाव पर तेल खरीदना पड़ता है। इससे चीन में उत्पादन की लागत बढ़ गई है, जो वैश्विक बाजार में उसकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को कमजोर कर रही है।
रूस की 'प्राइसिंग पावर' का खात्मा
यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका ने एक मास्टरस्ट्रोक खेला। उसने यूरोप को रूसी गैस और तेल से पूरी तरह काट दिया। जो यूरोप कभी पूरी तरह रूस पर निर्भर था, वह आज अमेरिकी तेल और LNG का सबसे बड़ा खरीदार बन चुका है। खरीदार न मिलने की स्थिति में रूस को अपना तेल भारत और चीन जैसे देशों को भारी छूट पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इससे रूस की 'प्राइसिंग पावर' यानी अपनी कीमत खुद तय करने की ताकत खत्म हो गई है। वह अब बाजार का नेतृत्व नहीं कर रहा, बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था बचाने के लिए मोलभाव करने पर मजबूर है।
डॉलर बनाम युआन: असली लड़ाई
चीन की एक बहुत पुरानी कोशिश रही है कि वह वैश्विक तेल व्यापार को अपनी मुद्रा 'युआन' में शिफ्ट कर दे, ताकि अमेरिकी डॉलर का दबदबा खत्म हो सके। ईरान और वेनेजुएला इस 'डी-डॉलरलाइजेशन' मुहिम के सबसे बड़े सहयोगी थे। अमेरिका ने इन दोनों देशों की तेल अर्थव्यवस्था को अस्थिर करके सीधे तौर पर चीन के उस वित्तीय तंत्र पर चोट की है जो डॉलर को चुनौती देना चाहता था। आज भी वैश्विक तेल व्यापार डॉलर में ही सिमटा हुआ है, और अमेरिका प्रतिबंधों के जरिए यह तय कर रहा है कि कौन देश व्यापार करेगा और कौन नहीं।
वेनेजुएला: अमेरिका का नया तेल केंद्र
रणनीति का एक और अहम हिस्सा वेनेजुएला है। अमेरिका ने वहां सत्ता परिवर्तन की कोशिशों और कड़े आर्थिक दबाव के जरिए वहां के विशाल तेल भंडारों पर अपना परोक्ष नियंत्रण बनाने की कोशिश की है। अब अमेरिका वेनेजुएला के तेल को वापस अपनी रिफाइनरियों की ओर मोड़ने में सफल हो रहा है, जो पहले चीन की ओर जा रहा था। इससे रूस का वहां किया गया अरबों डॉलर का निवेश भी जोखिम में आ गया है।
अमेरिका आज दुनिया का नंबर-1 तेल उत्पादक है। उसने अपनी 'एनर्जी डिप्लोमेसी' को एक ऐसे हथियार में बदल दिया है जो बिना गोली चलाए भी बड़े-बड़े साम्राज्यों को हिला सकता है। चीन अब इस नाकेबंदी से बचने के लिए रिकॉर्ड स्तर पर अपने तेल भंडार (Strategic Reserves) भर रहा है, लेकिन अमेरिकी नियंत्रण ने उसकी आर्थिक रफ्तार को धीमा जरूर कर दिया है। यह लड़ाई जमीन से ज्यादा समंदर की लहरों और तेल की पाइपलाइनों में लड़ी जा रही है, जहाँ फिलहाल बाजी अमेरिका के हाथ में दिखाई दे रही है।
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