नालंदा विश्वविद्यालय में CSEAS का उद्घाटन: भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच बनेगा 'नॉलेज ब्रिज'
नालंदा विश्वविद्यालय में CSEAS की स्थापना। भारत-आसियान संबंधों को मजबूत करने के लिए नॉलेज पार्टनर की भूमिका निभाएगा यह केंद्र।
राजगीर। ऐतिहासिक नालंदा की धरती एक बार फिर वैश्विक ज्ञान का केंद्र बनने की राह पर है। राजगीर स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में 'सेंटर फॉर साउथईस्ट एशियन स्टडीज' (CSEAS) की स्थापना के साथ ही भारत ने दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ अपने संबंधों को एक नई ऊंचाई दी है। विदेश मंत्रालय में सचिव (पूर्व) पी. कुमारन ने इस विशेष केंद्र का उद्घाटन किया।
एक्ट ईस्ट पॉलिसी को मिलेगी नई मजबूती
यह केंद्र मात्र एक अकादमिक संस्थान नहीं, बल्कि भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' का एक जीवंत स्तंभ है। इसकी घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2025 में कुआलालंपुर में आयोजित 22वें आसियान-भारत शिखर सम्मेलन के दौरान की थी। CSEAS का मुख्य उद्देश्य 2026-2030 के लिए 'आसियान-भारत व्यापक रणनीतिक साझेदारी' को बौद्धिक और नीतिगत सहयोग प्रदान करना है।
10 अंतर्विषयक अनुसंधान समूहों पर फोकस
यह केंद्र केवल इतिहास तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आधुनिक चुनौतियों के समाधान पर कार्य करेगा। इसके तहत 10 प्रमुख विषयों पर शोध होगा:
- जलवायु और समुद्री अध्ययन
- व्यापार और डिजिटल सहयोग
- सार्वजनिक स्वास्थ्य और प्रवासन
- सांस्कृतिक विरासत और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
दीक्षांत समारोह: तकनीक और परंपरा का संगम
केंद्र के उद्घाटन के साथ ही विश्वविद्यालय का दूसरा दीक्षांत समारोह भी आयोजित हुआ। इस गरिमामय अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने शिरकत की। राष्ट्रपति ने परिसर में 'बोधि वृक्ष' का पौधा लगाया और 2000 सीटों वाले विशाल सभागार 'विश्वामित्रालय' का लोकार्पण किया।
इस अवसर पर विदेश मंत्री ने 31 देशों के 600 से अधिक स्नातकों को बधाई देते हुए कहा कि नालंदा भारत की उस बौद्धिक भव्यता का प्रतीक है जहाँ 'विकास' और 'विरासत' साथ-साथ चलते हैं।
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