Allahabad High Court : पिता को मिली 13 महीने के मासूम की कस्टडी, मौसा-मौसी का कब्जा अवैध
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 13 महीने के बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपी, कहा—बच्चे का सर्वोत्तम हित प्राकृतिक अभिभावक के पास सुरक्षित है।
प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में 'बाल कल्याण' और 'प्राकृतिक अभिभावक' के अधिकारों को रेखांकित करते हुए एक दूरगामी फैसला सुनाया है। न्यायालय ने 13 महीने के मासूम अक्षित पांडेय की कस्टडी उसके पिता विपिन कुमार पांडेय को सौंपने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी भी नाबालिग के भविष्य और मानसिक विकास के लिए उसका अपने पिता के साथ रहना ही सर्वोपरि है।
यह मामला एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका के जरिए कोर्ट पहुंचा था। याचिकाकर्ता विपिन पांडेय की पत्नी दीपिका का निधन फरवरी 2025 में एक असफल IVF प्रक्रिया के दौरान हो गया था। पत्नी की मृत्यु के बाद से बच्चा उसके मौसा-मौसी के पास था।
विपक्षी की दलील: मौसा-मौसी ने तर्क दिया कि बच्चा प्री-मैच्योर (समय से पूर्व) पैदा हुआ है, इसलिए उसे मौसी की विशेष देखभाल की जरूरत है। उन्होंने पत्नी की मृत्यु के लिए भी पिता के आचरण को संदेहास्पद बताया।
कोर्ट का रुख: अदालत ने इन तर्कों को आधारहीन माना। कोर्ट ने कहा कि जब तक पिता के खिलाफ कोई आपराधिक मामला न हो, उसे पत्नी की मृत्यु का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नजीर पेश करते हुए कहा कि नाबालिग की कस्टडी में केवल 'बच्चे का कल्याण' ही मुख्य पैमाना है। कोर्ट ने पाया कि:
- पिता आर्थिक रूप से सक्षम है और देखभाल के लिए उचित संसाधन मौजूद हैं।
- पिता की बहन (बच्चे की बुआ) ने पालन-पोषण में पूर्ण सहयोग का भरोसा दिलाया है।
- महत्वपूर्ण टिप्पणी: यदि इस नाजुक उम्र में बच्चे को पिता से दूर रखा गया, तो उनके बीच कभी भावनात्मक जुड़ाव विकसित नहीं हो पाएगा, जो बच्चे के लिए नुकसानदेह होगा।
मुलाकात का अधिकार (Visitation Rights)
अदालत के आदेश पर बच्चे को पुलिस संरक्षण में कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ से उसे पिता को सौंप दिया गया। हालांकि, मानवीय संवेदनाओं को देखते हुए कोर्ट ने ननिहाल पक्ष (मौसा-मौसी) को प्रत्येक रविवार शाम 4:00 बजे से दो घंटे के लिए बच्चे से मिलने की अनुमति प्रदान की है।
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