देवभूमि का ₹3.21 लाख करोड़ का 'हरा सोना': जहां कानून से ज्यादा 'देवताओं के खौफ' से महफूज हैं जंगल, जानिए कैसे देश को मिल रही है संजीवनी

हिमाचल प्रदेश का ₹3.21 लाख करोड़ का 'हरा सोना' और देव आस्था कैसे बन रही है देश के फेफड़ों की ताकत?

Jun 05, 2026 - 11:19
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देवभूमि का ₹3.21 लाख करोड़ का 'हरा सोना': जहां कानून से ज्यादा 'देवताओं के खौफ' से महफूज हैं जंगल, जानिए कैसे देश को मिल रही है संजीवनी

शिमला : बदलते दौर में जहां दुनिया भर के देश कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो रहे हैं और ग्लोबल वार्मिंग की मार झेल रहे हैं, वहीं भारत का एक छोटा सा पहाड़ी राज्य 'हिमाचल प्रदेश' पूरी दुनिया के सामने पर्यावरण संरक्षण की एक अनूठी मिसाल पेश कर रहा है। अमूमन हम सोने-चांदी या जमीनी संपदा को ही असली दौलत मानते हैं, लेकिन देवभूमि हिमाचल के पास ₹3.21 लाख करोड़ का एक ऐसा 'हरा सोना' (वन संपदा) है, जो न केवल इस राज्य की रीढ़ है, बल्कि पूरे देश के फेफड़ों को ऑक्सीजन देकर नई जिंदगी भी दे रहा है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि जहां पूरी दुनिया में वनों को बचाने के लिए कड़े कानून और पुलिसिया पहरे की जरूरत पड़ती है, वहीं हिमाचल प्रदेश के कई हिस्सों में इस बेशकीमती खजाने की रखवाली स्वयं देवी-देवता करते हैं। यहां की सदियों पुरानी देव आस्था ने जंगलों को वो सुरक्षा कवच दिया है, जिसे भेद पाना वन माफियाओं के लिए भी नामुमकिन है।

हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी: 'सरकार को कर्ज दे सकता है वन विभाग'
हिमाचल प्रदेश की वन संपदा कितनी विशाल और समृद्ध है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि करीब चार साल पहले वन संरक्षण से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति तरलोक चौहान और न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने एक बेहद दिलचस्प टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा था कि हिमाचल के पास इतनी अधिक वन संपदा मौजूद है कि यहां का वन विभाग खुद राज्य सरकार तक को कर्ज देने की हैसियत रखता है।

पिछले साल सोलहवें वित्तायोग के समक्ष राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के मुताबिक, यदि केंद्र सरकार हिमाचल को अपनी इस ₹3.21 लाख करोड़ की वन संपदा के वैज्ञानिक दोहन (कमर्शियल यूज) की अनुमति दे दे, तो राज्य सरकार को प्रतिवर्ष ₹4,000 करोड़ की सीधी आय हो सकती है। हालांकि, पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने के लिए इस हरे सोने को काटा नहीं जाता, बल्कि इसे और सहेजा जा रहा है।

एशिया का एकमात्र 'कार्बन क्रेडिट' राज्य और वित्तायोग का इनाम
हिमाचल प्रदेश की इसी पर्यावरण-हितैषी सोच का परिणाम है कि यह एशिया का एकमात्र ऐसा राज्य है, जिसे जंगलों को बचाने और कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए 'कार्बन क्रेडिट स्टेट' के रूप में वैश्विक स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है। साल 2015 में विश्व बैंक ने हिमाचल प्रदेश के प्रयासों की सराहना करते हुए ₹1.93 करोड़ की प्रोत्साहन राशि (कार्बन क्रेडिट के रूप में) प्रदान की थी।

इतना ही नहीं, देश के पंद्रहवें वित्तायोग ने भी हिमाचल के वन संरक्षण प्रयासों से गदगद होकर टैक्स आवंटन में राज्य के हिस्से को 7.5 प्रतिशत से बढ़ाकर सीधे 10 प्रतिशत कर दिया था। यह इस बात का प्रमाण है कि हिमाचल का वन क्षेत्र देश की आबो-हवा को सुधारने में कितना बड़ा योगदान दे रहा है।

भौगोलिक क्षेत्र का 68% हिस्सा वनों के अधीन: सख्त हैं नियम
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 68.16 प्रतिशत हिस्सा (लगभग 37,986 वर्ग किलोमीटर) वन वर्गीकृत क्षेत्र के अंतर्गत आता है। इस पूरे क्षेत्र में केंद्रीय फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट (FCA) के बेहद सख्त प्रावधान लागू होते हैं। इसका मतलब यह है कि इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के छोटे या बड़े विकास कार्य (जैसे सड़क, बिजली परियोजना या भवन निर्माण) के लिए सीधे केंद्र सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है, जिसकी प्रक्रिया बेहद लंबी और जटिल है। इन बंदिशों के बावजूद हिमाचल का फॉरेस्ट कवर निरंतर बढ़ रहा है। वर्ष 2019 से 2021 के बीच राज्य के वन क्षेत्र में 0.06 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी, और वर्तमान में राज्य का वास्तविक फॉरेस्ट कवर 29.5 फीसदी है।

मिशन 2032: वित्त वर्ष 2026-27 में 8,000 हेक्टेयर में महकेगा नया जंगल
हिमाचल प्रदेश सरकार ने अब अपने फॉरेस्ट कवर को 29.5 फीसदी से बढ़ाकर साल 2032 तक 32 फीसदी करने का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इसी कड़ी में, वन विभाग ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान राज्य के 8,000 हेक्टेयर क्षेत्र में सघन पौधारोपण करने का खाका तैयार किया है।

राजीव गांधी वन संवर्धन योजना: इस अभियान को जन-आंदोलन बनाने के लिए राज्य सरकार ने ₹100 करोड़ के बजट के साथ 'राजीव गांधी वन संवर्धन योजना' लागू की है। इसके तहत महिला मंडलों, युवक मंडलों, स्वयंसेवी संस्थाओं (NGOs) और सेल्फ हेल्प ग्रुप्स को बंजर जमीनों पर पौधे लगाने के लिए प्रेरित और आर्थिक रूप से असिस्ट किया जाता है। सेना की इको बटालियन भी इसमें कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही है। पिछले वर्ष (2025) में ही इस योजना के तहत 924 हेक्टेयर भूमि पर पौधे लगाए गए थे, जिसमें 285 महिला मंडलों, 70 युवक मंडलों और 59 स्वयं सहायता समूहों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था। आपको जानकर हैरानी होगी कि पिछले दो दशकों में हिमाचल में रिकॉर्ड 32 करोड़ पौधे लगाए जा चुके हैं। वर्तमान में यहाँ के जंगलों में वृक्षों की 116 और औषधीय पौधों की 109 दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं।

जब देव आस्था के आगे नतमस्तक हुआ वन माफिया
हिमाचल प्रदेश में वनों के बचने की सबसे अनोखी और खूबसूरत वजह यहाँ की सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताएं हैं। राज्य के कई हिस्सों में 'देव वन' (Sacred Groves) की परंपरा है, जहां जंगलों का मालिकाना हक सीधे स्थानीय देवी-देवताओं का माना जाता है।

ऊना की शिव बाड़ी: ऊना जिले में स्थित 'शिव बाड़ी' के घने जंगलों से कोई भी व्यक्ति लकड़ी का एक छोटा टुकड़ा या टहनी भी घर नहीं ले जा सकता। यहाँ की लकड़ी का उपयोग केवल और केवल किसी की अंतिम क्रिया (दाह संस्कार) के लिए ही किया जा सकता है। यही वजह है कि यह जंगल सदियों से बेहद घना और सुरक्षित है।

कुल्लू के 200 देव वन: कुल्लू जिले में 'रिंगू नाग' के वन सहित करीब 200 से अधिक ऐसे जंगल हैं, जो देवताओं की संपत्ति हैं। इन जंगलों से पेड़ काटने की इजाजत तभी मिलती है जब देवता का रथ बनाना हो या मंदिर का जीर्णोद्धार करना हो। यदि कोई आम इंसान अपनी निजी जरूरत के लिए यहाँ कुल्हाड़ी भी चला दे, तो माना जाता है कि उसे देव-प्रकोप का सामना करना पड़ेगा। इसी डर और अगाध श्रद्धा के कारण यहाँ वन माफिया कभी पैर नहीं पसार पाए।

शिमला की हासन वैली: शिमला जिले के हासन वैली और बधौणी के जंगलों में देवदार के इतने विशालकाय और घने पेड़ हैं कि दोपहर के वक्त भी सूरज की किरणें जमीन तक नहीं पहुंच पातीं।

1864 से चला आ रहा है वन विभाग का गौरवशाली इतिहास
हिमाचल प्रदेश का वन प्रशासनिक ढांचा देश के सबसे पुराने और व्यवस्थित ढांचों में से एक है। इसकी स्थापना ब्रिटिश काल के दौरान साल 1864 में हुई थी। तब से लेकर आज तक, यह विभाग आधुनिक तकनीकों और पारंपरिक तौर-तरीकों के मेल से जंगलों की रक्षा कर रहा है।

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का संदेश
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने राज्य की इस अनूठी उपलब्धि पर गर्व व्यक्त करते हुए कहा, "हिमाचल के वन केवल हमारी संपत्ति नहीं हैं, बल्कि ये पूरे देश के लिए फेफड़ों की तरह काम करते हैं, जो पर्यावरण को शुद्ध रख रहे हैं। हमारी सरकार वन संपदा के संरक्षण और संवर्धन के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। हमारा आगामी लक्ष्य राज्य के फॉरेस्ट कवर को बढ़ाकर 32 फीसदी तक ले जाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ और हरा-भरा पर्यावरण मिल सके।"

निश्चित रूप से, कानून और देव-आस्था के इस खूबसूरत संगम ने हिमाचल के 'हरे सोने' को न सिर्फ महफूज रखा है, बल्कि यह ग्लोबल वार्मिंग से जूझती इस दुनिया के लिए एक उम्मीद की नई किरण बनकर उभरा है।

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