पत्रकारों की पेंशन पर बड़ा कदम: यूपी के श्रम मंत्री करेंगे केंद्रीय मंत्री से सिफारिश, ₹5000 न्यूनतम पेंशन की मांग

यूपी वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन ने श्रम मंत्री अनिल राजभर को सौंपा ज्ञापन; न्यूनतम पेंशन ₹1000 से बढ़ाकर ₹5000 करने की मांग।

Mar 11, 2026 - 22:25
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पत्रकारों की पेंशन पर बड़ा कदम: यूपी के श्रम मंत्री करेंगे केंद्रीय मंत्री से सिफारिश, ₹5000 न्यूनतम पेंशन की मांग

लखनऊ, 11 मार्च 2026। उत्तर प्रदेश के पत्रकारों और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए एक बड़ी उम्मीद जगी है। उत्तर प्रदेश वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन (UPWJU) के एक प्रतिनिधिमंडल ने आज प्रदेश के श्रम मंत्री अनिल राजभर से मुलाकात कर भविष्य निधि संगठन (EPFO) द्वारा दी जा रही न्यूनतम मासिक पेंशन में पांच गुना वृद्धि की मांग उठाई है।

श्रम मंत्री अनिल राजभर ने प्रतिनिधिमंडल को भरोसा दिलाया कि वे इस गंभीर विषय पर शीघ्र ही केंद्रीय श्रम मंत्री से भेंट करेंगे। उन्होंने आश्वासन दिया कि वह पत्रकारों और निजी क्षेत्र के सेवानिवृत्त कर्मचारियों की न्यूनतम पेंशन को ₹1000 से बढ़ाकर ₹5000 करने की पुरजोर वकालत करेंगे।

अयोध्या सम्मेलन का संकल्प

यह मांग यूनियन के अयोध्या में आयोजित हालिया प्रादेशिक सम्मेलन में पारित प्रस्ताव का हिस्सा थी। यूनियन के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी ने वर्तमान पेंशन व्यवस्था को "हास्यास्पद और अन्यायपूर्ण" करार देते हुए कहा:

"₹1000 की न्यूनतम पेंशन का निर्धारण करीब 15 साल पहले हुआ था। आज के महंगाई के दौर में, जब विभिन्न सरकारें अन्य वर्गों को इससे कहीं अधिक सहायता दे रही हैं, जीवनभर पूर्णकालिक नौकरी करने वालों को मात्र एक हजार रुपये देना उनके संघर्ष का अपमान है।"

प्रतिनिधिमंडल की प्रमुख मांगें

  • न्यूनतम पेंशन में वृद्धि: ₹1000 के स्थान पर कम से कम ₹5000 मासिक पेंशन सुनिश्चित की जाए।

  • समानता: अन्य सामाजिक पेंशन योजनाओं की तुलना में कर्मचारी पेंशन को सम्मानजनक बनाया जाए।

  • केंद्रीय हस्तक्षेप: केंद्र सरकार के माध्यम से ईपीएफओ के नियमों में संशोधन।

प्रतिनिधिमंडल में यूनियन के प्रादेशिक महामंत्री देवराज सिंह, लखनऊ इकाई के अध्यक्ष शिवशरण सिंह, अब्दुल हसनैन ताहिर और आशीष कुमार सिंह शामिल रहे। श्रम मंत्री ने न केवल ज्ञापन स्वीकार किया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि वे इस मांग को पूरा कराने के लिए व्यक्तिगत रूप से प्रयास करेंगे ताकि पत्रकारों और कामगारों को उनके बुढ़ापे का सहारा सम्मानजनक रूप में मिल सके।

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