दृष्टि का नया सवेरा: अब जीन थेरेपी से मिटेगा जन्मजात अंधापन और लेजर तकनीक से मोतियाबिंद का अंत

AIOC 2026 में विशेषज्ञों ने जीन थेरेपी और फेम्टोसेकंड लेजर जैसी तकनीकों से अंधापन दूर करने की नई उम्मीद जगाई है।

Mar 14, 2026 - 20:28
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दृष्टि का नया सवेरा: अब जीन थेरेपी से मिटेगा जन्मजात अंधापन और लेजर तकनीक से मोतियाबिंद का अंत

जयपुर: चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे नित नए नवाचारों ने उन लाखों परिवारों के जीवन में रोशनी की नई किरण भर दी है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी दृष्टिहीनता का दंश झेल रहे थे। जयपुर में आयोजित चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘AIOC 2026’ में देशभर के नेत्र रोग विशेषज्ञों ने ऐसी अत्याधुनिक तकनीकों का प्रदर्शन किया है, जो न केवल इलाज को सटीक बनाती हैं, बल्कि असंभव माने जाने वाले मामलों में भी दृष्टि वापस ला रही हैं।

कॉन्फ्रेंस में पहुंचे देश के विख्यात नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. जीवन सिंह तितियाल ने रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा (RP) जैसी लाइलाज मानी जाने वाली बीमारियों पर एक क्रांतिकारी शोध साझा किया। उन्होंने बताया कि अब 'जीन थेरेपी' के माध्यम से अंधेपन की जड़ पर प्रहार करना संभव हो गया है।

रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा एक ऐसा विकार है जिसमें आंखों के पर्दे (रेटिना) की कोशिकाएं धीरे-धीरे मृत होने लगती हैं, जिससे पहले रात का अंधापन और फिर पूर्ण दृष्टिहीनता आ जाती है। डॉ. तितियाल के अनुसार, भारत में इसके मामले वैश्विक औसत से 5-6 गुना अधिक हैं।

डॉ. तितियाल ने समझाया कि इस प्रक्रिया में एक निष्क्रिय वायरस (वेक्टर) को वाहन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसके जरिए एक 'स्वस्थ जीन' को मरीज की क्षतिग्रस्त रेटिना कोशिकाओं में पहुंचाया जाता है। यह स्वस्थ जीन खराब जीन का स्थान ले लेता है और शरीर में आवश्यक प्रोटीन का निर्माण शुरू कर देता है, जिससे आंखों की रोशनी वापस लौटने लगती है। यदि यह इलाज बचपन में ही मिल जाए, तो बच्चा जीवन भर के अंधेपन से बच सकता है।

सिर्फ जन्मजात बीमारियां ही नहीं, बल्कि उम्र के साथ होने वाले मोतियाबिंद के इलाज में भी विज्ञान ने लंबी छलांग लगाई है। वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ डॉ. नम्रता शर्मा ने 'फेम्टोसेकंड लेजर' तकनीक के लाभ गिनाते हुए बताया कि अब मोतियाबिंद का ऑपरेशन मानवीय भूलों से पूरी तरह मुक्त हो चुका है।

इस तकनीक की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • सटीकता: कंप्यूटर-गाइडेड लेजर माइक्रोन स्तर तक सटीक कट लगाता है।
  • ब्लेड-रहित: इसमें किसी सर्जिकल ब्लेड या टांके का उपयोग नहीं होता।
  • त्वरित रिकवरी: सर्जरी के बाद संक्रमण का खतरा न्यूनतम होता है और मरीज बहुत जल्द अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट सकता है।
  • बेहतर विजन: लेजर तकनीक से प्राकृतिक लेंस के टुकड़े करना और कृत्रिम लेंस को सटीक स्थान पर फिट करना आसान हो गया है, जिससे चश्मे पर निर्भरता कम हो जाती है।

भारत में हर 750 में से एक व्यक्ति रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा से पीड़ित है। विशेषज्ञों का मानना है कि 'AIOC 2026' में चर्चा की गई ये तकनीकें भारत को 'दृष्टिहीनता मुक्त' बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होंगी। जहां जीन थेरेपी बच्चों को एक उज्ज्वल भविष्य दे रही है, वहीं फेम्टोसेकंड लेजर बुजुर्गों को एक स्पष्ट और बेहतर जीवन की गारंटी दे रहा है।

चिकित्सा जगत का यह बदलाव न केवल तकनीक की जीत है, बल्कि उन करोड़ों आंखों की जीत है जो वर्षों से उजाले का इंतजार कर रही थीं।

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