सैमसंग का 'संकल्प': चिप और स्क्रीन से आगे, 15 लाख युवाओं के भविष्य का निर्माण
सैमसंग इंडिया ने CSR के जरिए 15 लाख युवाओं को AI और कोडिंग में प्रशिक्षित कर डिजिटल भारत की नींव मजबूत की है
लखनऊ : भारत में सैमसंग का नाम अक्सर प्रीमियम स्मार्टफोन या विशाल मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में लिया जाता है, लेकिन इसकी असली कहानी उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों, तमिलनाडु की कोडिंग लैब और IIT दिल्ली के इनक्यूबेशन सेंटरों में लिखी जा रही है। सैमसंग इंडिया ने कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) को एक औपचारिक प्रक्रिया से बदलकर एक 'इनोवेशन इकोसिस्टम' का रूप दे दिया है, जिससे अब तक 1.5 मिलियन (15 लाख) जिंदगियां बदल चुकी हैं।
कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अपने CSR बजट को बढ़ाकर 193.89 करोड़ रुपये कर दिया है। यह निवेश केवल मशीनों के लिए नहीं, बल्कि डिजिटल इंडिया के भविष्य—हमारे युवाओं—के लिए है।
सैमसंग के अभियानों का केंद्र 'सैमसंग इनोवेशन कैंपस' (SIC) है। 77.25 करोड़ रुपये के बजट के साथ, यह कार्यक्रम AI, IoT और बिग डेटा जैसी अत्याधुनिक तकनीकों में युवाओं को प्रशिक्षित कर रहा है। 2025 में इसका विस्तार 10 राज्यों के 20,000 छात्रों तक किया गया है। इसमें लैंगिक समावेश (Gender Inclusion) का विशेष ध्यान रखा गया है, जहां देशभर में 48% और अकेले तमिलनाडु में 70% से अधिक महिलाएं भागीदारी कर रही हैं।
सिर्फ कौशल सिखाना ही काफी नहीं है, उसे लागू करना भी जरूरी है। 'सल्व फॉर टुमॉरो' पहल के जरिए सैमसंग युवाओं को सामाजिक समस्याओं के समाधान खोजने के लिए प्रेरित कर रहा है। पर्यावरण और स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाले प्रोजेक्ट्स को 90 लाख रुपये से अधिक की फंडिंग दी जा रही है। गुरुग्राम की टीम 'पैरास्पीक' जैसी सफलताएं इसका जीता-जागता उदाहरण हैं।
रिटेल और सर्विस सेक्टर में करियर बनाने की इच्छा रखने वाले वंचित युवाओं के लिए 'DOST' (डिजिटल एंड ऑफलाइन स्किल्स ट्रेनिंग) प्रोग्राम वरदान साबित हो रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शब्दों में, यह पहल युवाओं के लिए केवल तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता और सम्मान का मार्ग प्रशस्त करती है।
सैमसंग का यह मॉडल साबित करता है कि एक वैश्विक कंपनी की सबसे स्थायी पहचान उसके उत्पादों की बिक्री से नहीं, बल्कि उस देश की मानव क्षमता के निर्माण से तय होती है।
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