बंजर भूमि में लहलहाएगी पीली क्रांति: प्रतापगढ़ के किसानों के लिए वरदान बनी सरसों की 'CS-61' प्रजाति
प्रतापगढ़ की ऊसर भूमि अब उगलेगी सोना। कृषि विज्ञान केंद्र ने CS-61 सरसों प्रजाति का सफल प्रदर्शन कर किसानों की आय बढ़ाने की राह खोली।
कुंडा-प्रतापगढ़। जनपद के उन किसानों के लिए एक बड़ी खुशखबरी है जिनकी जमीन ऊसर होने के कारण खेती के लिए अनुपयोगी मानी जाती थी। कृषि विज्ञान केन्द्र (KVK) ऐंठू कालाकांकर द्वारा चलाए गए एक विशेष प्रदर्शन कार्यक्रम के तहत ऊसर अवरोधी सरसों की उन्नत प्रजाति सी.एस.-61 (CS-61) ने खेतों में अपना दम दिखाया है।
कालाकांकर, बाबागंज और रामपुर संग्रामगढ़ के विभिन्न गांवों (बजहा भीट, लरू, लकुरी और बीर सिंह पुर) में लगभग 100 हेक्टेयर क्षेत्र में इस प्रजाति का प्रदर्शन किया गया। कुल 250 किसानों के खेतों पर आयोजित इस कार्यक्रम ने यह साबित कर दिया कि सही तकनीक और बीज के चुनाव से ऊसर भूमि भी सोना उगल सकती है।
- CS-61 प्रजाति की मुख्य विशेषताएं
ग्राम बजहाभीट में आयोजित 'प्रक्षेत्र दिवस' के दौरान वैज्ञानिकों ने इस प्रजाति की खूबियां गिनाईं: - कम समय में पैदावार: यह फसल मात्र 130-135 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।
- बंपर उपज: सामान्य परिस्थितियों में 22-24 क्विंटल और ऊसर भूमि में भी 18-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक की पैदावार संभव है।
- अधिक तेल की मात्रा: सामान्य सरसों के मुकाबले इसमें 2-5% ज्यादा तेल पाया जाता है, जिससे बाजार में इसकी मांग और कीमत दोनों अधिक रहती है।
"जहाँ धान की कटाई के बाद जमीन खाली छोड़नी पड़ती थी, वहां अब किसान सरसों की सफल खेती कर अपनी आय दोगुनी कर सकते हैं।" — डॉ. नवीन कुमार सिंह, प्रभारी वैज्ञानिक
प्रसार वैज्ञानिक डॉ. अवधेश कुमार सिंह ने आर्थिक लाभ पर जोर दिया, वहीं श्री महेन्द्र प्रताप सिंह ने किसानों को बीज भंडारण की बारीकियां सिखाईं। उद्देश्य यह है कि किसान अगले साल के लिए खुद गुणवत्तायुक्त बीज तैयार कर सकें और बाजार पर उनकी निर्भरता कम हो।
इस मौके पर अशोक कुमार, सुनीता और राजेंद्र प्रसाद जैसे प्रगतिशील किसानों ने वैज्ञानिकों के साथ फसल का निरीक्षण किया और इस तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने का संकल्प लिया।
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