अमित शाह का विपक्ष पर प्रहार—'सदन मेला नहीं, नियमों से चलेगा'
लोकसभा में स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव खारिज; अमित शाह ने कहा—सदन नियमों से चलेगा, अनुशासनहीनता पर माइक बंद और निष्कासन तय।
लखनऊ। भारतीय संसदीय इतिहास में लगभग चार दशकों के बाद लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर हुई चर्चा ने देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। 13 घंटे चली लंबी बहस और 40 से अधिक सांसदों के विचारों के बाद, यह प्रस्ताव ध्वनि मत से खारिज हो गया। लेकिन इस पूरी चर्चा के केंद्र में रहे गृह मंत्री अमित शाह, जिन्होंने अपने तर्कों से विपक्ष की रणनीति को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।
अमित शाह ने सदन में अपनी बात रखते हुए स्पष्ट किया कि संसद की गरिमा नियमों और तथ्यों पर टिकी होती है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज रही कि क्या यह प्रस्ताव वास्तव में स्पीकर के विरुद्ध था या राहुल गांधी की एक 'असरदार सांसद' के रूप में विफलता को छिपाने का प्रयास? चर्चा के दौरान यह मुद्दा उठा कि जब महत्वपूर्ण विषयों पर बहस होती है, तब मुख्य विपक्षी नेता अक्सर विदेश यात्राओं पर होते हैं। ऐसे में सदन की कार्यवाही और समय पर उपस्थिति के बिना 'बोलने का मौका न मिलने' की शिकायत तर्कहीन प्रतीत होती है।
सदन में कड़ा संदेश देते हुए शाह ने कहा, "सदन कोई मेला नहीं है।" उन्होंने नियम 374, 375 और 380 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि अनुशासनहीनता और असंसदीय आचरण पर स्पीकर को माइक बंद करने और निष्कासन तक का पूर्ण अधिकार है। संसदीय लोकतंत्र में स्पीकर को केवल एक अधिकारी नहीं, बल्कि सदन का संरक्षक माना जाता है, और उनकी निष्ठा पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक साख को चोट पहुँचाने जैसा है।
बहस के दौरान सरकार ने अपनी उपलब्धियों को भी रेखांकित किया। शून्यकाल का विस्तार, महिला सांसदों को प्राथमिकता, क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग और 'डिजिटल संसद' जैसे सुधारों ने कार्यसंस्कृति को आधुनिक बनाया है। अंततः, सदन से यही संदेश निकला कि लोकतंत्र की असली ताकत संस्थाओं पर हमला करने में नहीं, बल्कि जिम्मेदार राजनीति और नियमों के पालन में है।
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