लाल किला: क्या इतिहास की किताबों ने हमसे सच छुपाया? ऑक्सफोर्ड की पेंटिंग और अनंगपाल तोमर का अनसुना सच

Dec 21, 2025 - 13:32
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लाल किला: क्या इतिहास की किताबों ने हमसे सच छुपाया? ऑक्सफोर्ड की पेंटिंग और अनंगपाल तोमर का अनसुना सच


भारतीय इतिहास के पन्नों में अक्सर यह पढ़ाया जाता है कि दिल्ली के भव्य लाल किले का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहाँ ने 1638 में शुरू करवाया था। लेकिन हाल ही में सामने आए कुछ तर्क और ऐतिहासिक साक्ष्य इस दावे पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं। सबसे बड़ा सवाल एक पेंटिंग को लेकर है, जो कथित तौर पर ऑक्सफोर्ड संग्रहालय, लंदन में संरक्षित है।

1628 की पेंटिंग और शाहजहाँ का रहस्य
इतिहासकारों के एक वर्ग का दावा है कि इस संग्रहालय में एक ऐसी पेंटिंग मौजूद है, जो 1628 की बताई जाती है। इस पेंटिंग में शाहजहाँ को लाल किले के भीतर एक विदेशी राजदूत का स्वागत करते हुए दिखाया गया है। यदि आधिकारिक इतिहास के अनुसार किले का निर्माण ही 1638 में शुरू हुआ, तो शाहजहाँ 10 साल पहले यानी 1628 में उसके भीतर दरबार कैसे लगा रहा था? यह विसंगति संकेत देती है कि किला शाहजहाँ के आने से बहुत पहले ही अस्तित्व में था।

महाराजा अनंगपाल तोमर और 'लालकोट' का संबंध
पुरातत्व प्रेमियों और शोधकर्ताओं का मानना है कि जिसे हम आज 'लाल किला' कहते हैं, वह वास्तव में 12वीं सदी में महाराजा अनंगपाल तोमर द्वारा निर्मित करवाया गया महल और दुर्ग था। प्राचीन ग्रंथों में इसे 'लालकोट' के नाम से जाना जाता था। हिंदू स्थापत्य कला के विशेषज्ञों का तर्क है कि किले की दीवारों पर मिलने वाले फूल-पत्ती के नक्काशीदार पैटर्न और हाथी-कलश जैसे प्रतीक विशुद्ध भारतीय वास्तुकला की पहचान हैं।

वास्तुकला पर एक बड़ा सवाल
एक तर्क यह भी दिया जाता है कि यदि मुगलों के पास ऐसी अद्भुत वास्तुकला का ज्ञान था, तो उनके मूल निवास स्थानों—उज़्बेकिस्तान या सऊदी अरब—में इस तरह की भव्य शैलियों वाले किले क्यों नहीं मिलते? उज़्बेकिस्तान की समरकंद और बुखारा जैसी जगहों पर नीले गुंबद और ईंटों का काम मिलता है, लेकिन लाल बलुआ पत्थर की यह विशिष्ट भारतीय शैली वहां अनुपस्थित है। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या मुगलों ने केवल पहले से मौजूद हिंदू ढांचों का नाम बदला और उनमें कुछ फेरबदल किए?

निष्कर्ष: पुनर्लेखन की आवश्यकता?
यह दावा कि लाल किला पांडव पुत्र अर्जुन के वंशजों और बाद में तोमर राजाओं की विरासत है, इतिहास की एक नई बहस को जन्म देता है। यदि विदेशी संग्रहालयों के साक्ष्य आधिकारिक तिथियों को चुनौती दे रहे हैं, तो क्या समय आ गया है कि हम अपने गौरवशाली स्मारकों के वास्तविक मूल की निष्पक्ष जांच करें?

(Taken From We support hindutava unity / Facebook)

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