वज्रवाराही योगिनी: कृपा और संहार की उग्र देवी, बौद्ध तंत्रवाद की उत्पत्ति का केंद्र
वज्रवाराही योगिनी, मोह-अहंकार का नाश करने वाली उग्र देवी; उनकी प्रतीकात्मकता और उदियाना से संबंध जानें।
वज्रवाराही योगिनी बौद्ध और हिन्दू, दोनों परंपराओं में पूजनीय एक उग्र और शक्तिशाली देवी हैं, जिन्हें कृपा और संहार दोनों की अधिष्ठात्री माना जाता है। यह देवी मोह और अहंकार जैसी सांसारिक बाधाओं का नाश करती हैं और आत्मज्ञान के लिए एक तीव्र मार्ग प्रदान करती हैं।
💥 स्वरूप और प्रतीकात्मकता
वज्रवाराही को आमतौर पर रक्त-लाल रंग के उग्र रूप में दर्शाया जाता है। उनका स्वरूप गहन प्रतीकात्मकता से भरा है:
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आभूषण और आयुध: वे खोपड़ियों का हार पहनती हैं, जो संस्कृत वर्णमाला के अक्षरों और वाणी की शुद्धि का प्रतीक है। उनके हाथों में एक कपाल-प्याला (खोपड़ी का कटोरा) और एक चमड़ी उधेड़ने वाला चाकू होता है। चाकू सांसारिक आसक्तियों को तोड़ने का प्रतीक है, जबकि कपाल-प्याले को वह आनंद पात्र या अक्षय पात्र मानकर भक्तों पर आनंद की वर्षा करती हैं।
नृत्य मुद्रा: उनका एक पैर ऊपर की ओर मुड़ा हुआ होता है, जो यह दर्शाता है कि वे संसार में निहित होते हुए भी अपने पारलौकिक रूप में उससे परे हैं।
त्रिमुख: 'सिद्ध धर्म' शास्त्रों के अनुसार, उनके तीन मुख हैं। मध्य मुख उनका दिव्य व्यक्तित्व है। एक ओर वराह (सूअर) मुख उनके पाशविक प्रवृत्तियों और चरम तम को समझने की आवश्यकता का प्रतिनिधित्व करता है। दाहिनी ओर का लाल वराह मुख इंद्रियों के बंधनों और व्यावहारिक मामलों में निवास करने का प्रतीक है, जबकि बाईं ओर का गहरा नीला वराह मुख इंद्रियों से परे के लोकों और पारलौकिक वास्तविकता को दर्शाता है।
अन्य प्रतीक: वह नग्न रूप में चित्रित हैं, जो सत्य के बोध का प्रतीक है। उनके कंधे पर खट्वांग अस्त्र है, जो तीनों गुणों से परे उनके शासन और महान क्षमता (महा सामर्थ्य) का प्रतीक है। पाँच खोपड़ियों का उनका मुकुट पाँच तत्वों और मानव शरीर के पंच कोशों (अन्नमय से आनंदमय तक) में उनकी उपस्थिति का संकेत देता है।
उन्हें कभी-कभी काल भैरव और काल रात्रि के शिखर पर एक योद्धा मुद्रा में चित्रित किया जाता है, जो ब्रह्मांड पर उनके परम नियंत्रण को दर्शाता है।
🗺️ वज्रयोगिनी गाँव और उदियाना से संबंध
वज्रयोगिनी केवल एक देवी ही नहीं, बल्कि वांग - समता प्रदेश के परगना विक्रमपुर क्षेत्र में स्थित एक प्राचीन गाँव का नाम भी है। इस गाँव के आसपास जम्भल, परणाशबरी, वज्रसत्व और तारा जैसी कई वज्रयान प्रतिमाएँ मिली हैं, जिससे इसका स्पष्ट बौद्ध मूल सिद्ध होता है।
ऐतिहासिक रूप से, वज्रयोगिनी को समर्पित मंदिर केवल चार स्थानों पर ही पाए जाते थे: कामाख्या, सिरिहट्टा (सिलहट), पूर्णगिरि और उदियाना। यह माना जाता है कि वर्तमान वज्रयोगिनी गाँव ही मूलतः उड्डियाना के नाम से जाना जाता था, जहाँ बौद्धों के तंत्रवाद की उत्पत्ति हुई थी। कालांतर में, देवी वज्रयोगिनी का नाम अधिक लोकप्रिय हुआ और उन्होंने उड्डियाना के मूल नाम की जगह ले ली। इस प्रकार यह गाँव तंत्र-योग साधना और बौद्ध दर्शन के प्रसार का एक ऐतिहासिक केंद्र रहा है।
वज्रयोगिनी की योग-तंत्र साधना को आत्मज्ञान का शीघ्र मार्ग माना जाता है, लेकिन परंपरावादी चेतावनी देते हैं कि इसकी गहन साधना और मंत्रों के प्रयोग के लिए केवल एक योग्य गुरु ही उचित मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है।
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