Uttrakhand पौड़ी गढ़वाल के वीर सपूत राइफलमैन जसवंत सिंह रावत

Uttrakhand के पौड़ी गढ़वाल जिले के बादयूं की मिट्टी में 19 अगस्त, 1941 को जन्में जसवंत सिंह रावत के रगों में देशप्रेम इस कदर दौड़ता था कि 17 साल की उम्र में ही वो सेना में भर्ती होने निकल पड़े। हालांकि, कम उम्र के कारण शुरुआत में नहीं लिए गए, लेकिन उनकी लगन रंग लाई और 19 अगस्त 1960 को वह बतौर राइफलमैन सेना में शामिल हो गए।

Oct 24, 2025 - 11:21
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Uttrakhand पौड़ी गढ़वाल के वीर सपूत राइफलमैन जसवंत सिंह रावत

ट्रेनिंग पूरी होने के ठीक एक साल बाद, 17 नवंबर, 1962 को चीन ने अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा करने के इरादे से हमला कर दिया। नूरानांग ब्रिज की सुरक्षा के लिए तैनात, जसवंत सिंह, लांस नायक त्रिलोकी सिंह नेगी और गोपाल गुसाईं ने अदम्य साहस का परिचय दिया। सेना की बटालियन को वापस बुलाए जाने के बावजूद, ये तीनों वीर सैनिक पीछे नहीं हटे।

जान हथेली पर रखकर, ये जाँबाज़ चट्टानों और झाड़ियों में छिपते हुए दुश्मन के बंकर तक पहुंचे और हैंड ग्रेनेड फेंककर चीनी मशीनगन छीन लाए। इससे पूरी लड़ाई का रुख पलट गया और चीन का अरुणाचल प्रदेश को जीतने का सपना चकनाचूर हो गया। इसके बाद, चीनी सेना हावी होने लगी। तब जसवंत सिंह ने असाधारण रणनीति अपनाई। वह अकेले अलग-अलग बंकरों से गोलीबारी करते थे और रात को सभी में मशाल जलाते थे। चीनी सेना को यह लगा कि वहाँ सैकड़ों भारतीय जवान मौजूद हैं! लगातार 72 घंटे तक बिना खाए-पीए, जसवंत सिंह रावत ने अकेले 300 से अधिक चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया।

आखिरकार, चीनी सैनिकों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। उनकी शहादत के बाद, जब चीनी कमांडर को पता चला कि 3 दिन से एक अकेला जवान उनसे लड़ रहा था, तो वह जसवंत सिंह के साहस से इतना प्रभावित हुआ कि उसने उनके सम्मान में सिर वापस भेजा। इस अद्वितीय वीरता के लिए जसवंत सिंह रावत को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

नूरानांग में आज भी उनका स्मारक "जसवंतगढ़" बना है। इस पोस्ट को एक मंदिर में बदल दिया गया है, जहाँ उनकी वर्दी, जूते और बिस्तर रखे हैं। यह लोक मान्यता है कि जसवंत बाबा (जसवंत सिंह) आज भी सरहद की रखवाली करते हैं। यहाँ तैनात जवान बताते हैं कि कई बार उनके जूते कीचड़ में सने मिलते हैं या बिस्तर पर सिलवटें होती हैं, जैसे रात को कोई सोया हो।

यह अनोखा सम्मान है कि सेना आज भी उन्हें प्रमोशन देती है! सिपाही से लेकर जनरल तक, जसवंतगढ़ से गुजरने वाला हर शख्स इस अमर शहीद को सैल्यूट किए बिना आगे नहीं बढ़ता।

भारत माता के इस वीर सपूत की गाथा हर भारतीय तक पहुँचनी चाहिए! इस पोस्ट को इतना शेयर करें कि हर देशवासी को उनके बलिदान पर गर्व हो। जय हिंद!

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