गृध्रराज जटायु का आत्मोत्सर्ग: सीता हरण और राम से अंतिम भेंट
रावणके रथपर विवश एवं भयभीत सीता 'हा राम ! हा लक्ष्मण !' कहते हुए करुणस्वरमें विलाप करती जा रही थीं। गृध्रराज जटायुके कानोंमें सीताजीके आर्त-क्रन्दनका स्वर पड़ा। उसने तत्काल रघुकुलतिलक श्रीरामकी पत्नीका स्वर पहचान लिया। उसे समझते देर न लगी कि सीताजी भयंकर विपत्तिमें हैं। क्षणमात्रमें उसने अपने कर्तव्यका निश्चय किया और वायुवेगसे रावणकी ओर उड़ चला। उसने देखा कि रावणके रथपर सीताजी बुरी तरह छटपटा रही हैं। उनकी अवस्था उस समय म्लेच्छके वशमें पड़ी कपिला गाय-जैसी है।
जटायुने कहा— 'पुत्री सीता ! तुम चिन्ता मत करो। मैं अति शीघ्र इस दुराचारी राक्षसका अन्त करके तुम्हें इस नीचके चंगुलसे छुड़ा लूँगा।' ऐसा कहकर वह इन्द्रके वज्रकी तरह रावणके रथकी ओर दौड़ा और रावणसे कहा— 'रे दुष्ट ! खड़ा रह, मेरे जीवित रहते तू श्रीरामकी प्राणप्रिया पत्रीको नहीं ले जा सकता।'
यमराजकी तरह जटायुको अपनी ओर बढ़ते देखकर रावणने कहा— 'बूढ़े जटायु ! अब लगता है तेरा अन्त समय आ गया है। तू शीघ्र ही मेरे इन तीखे बाणोंसे मरकर यमलोकको जायगा।'
जटायुने क्रोधित होकर कहा— 'नीच राक्षस ! तू मेरी सलाह मानकर सीताको छोड़ दे और कुशलपूर्वक लंका लौट जा, अन्यथा भगवान् श्रीरामकी क्रोधाग्निमें तेरा सर्वनाश हो जायगा।' इतना कहकर जटायुने अपनी चोंचसे रावणके बालोंको पकड़कर उसे रथसे नीचे खींच लिया। रावण पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके बाद जटायुने सीताजीको उतारकर एक ओर बैठा दिया। फिर अपनी चोंच और नखोंके प्रहारसे उसने रावणके शरीरको विदीर्ण कर दिया। क्षणभरकी मूर्च्छाके बाद रावण कुपित होकर उठा। फिर अपनी भयानक कटारसे उसने जटायुके पंख काट दिये। जटायु श्रीरामका स्मरण करता हुआ धरतीपर गिर पड़ा और रावण सीताजीको पुनः रथमें बैठाकर उतावलीसे लंकाकी ओर चल दिया।
इधर लक्ष्मणजीको अपनी ओर आते देखकर भगवान् श्रीराम विशेष चिन्तित हुए। उन्होंने लक्ष्मणसे कहा— 'लक्ष्मण ! तुम जानकीको वनमें अकेली छोड़कर चले आये। वहाँ नाना प्रकारके मायावी राक्षसोंका झुण्ड फिरा करता है। मेरा मन कहता है कि सीता आश्रममें नहीं है।'
फिर श्रीराम लक्ष्मणके साथ लौटकर अपने आश्रममें आये और आश्रममें सीताको न देखकर वे सामान्य विरही मनुष्यकी भाँति शोक करने लगे। वे वनकी द्रुम-लताओंसे सीताका पता पूछते हुए इधर-उधर उनकी खोज करने लगे। आगे मार्गमें गृध्रराज जटायु मिला। वह भगवान् श्रीरामके चरणोंकी रेखाओं स्मरण कर रहा था। रक्तसे डूबा हुआ जटायु मात्र श्रीरामके दर्शनोंके लिये ही अपने प्राणोंको रोक रखा था। भगवान् श्रीरामने उसके पास पहुँचकर अपने करकमलसे उसके सिरका स्पर्श किया। श्रीरामके दर्शनमात्रसे उसकी सारी पीड़ा जाती रही। धीरज धारणकर जटायुने श्रीरामसे कहा— 'हे नाथ ! लंकापति रावणने मेरी यह दशा की है। वही दुष्ट सीताजीका हरण कर उन्हें दक्षिण दिशाकी ओर ले गया है। अब आप मुझे इस शरीरको छोड़कर जानेकी आज्ञा दीजिये।' भगवान् श्रीरामने कहा— 'हे तात ! आपको मुनियोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ मेरे परमधामकी प्राप्ति होगी। इसमें मेरा आपपर कोई उपकार नहीं है, अपितु यह आपके द्वारा परहितमें किये गये तन-त्यागका परिणाम है।' फिर सबके देखते-देखते जटायु चतुर्भुजरूप धारणकर और भगवान्की स्तुति करके परमधामको चले गये।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0