उषा फाउंडेशन ने बुज़ुर्गों की सेवा कर पेश की मानवता की मिसाल
उषा फाउंडेशन ने स्वर्गीय उषा गुप्ता की स्मृति में वृद्धजनों को बांटी राहत सामग्री; सेवा और संस्कारों का अनूठा संगम।
लखनऊ: समाज में जब संवेदनाएं कम होने लगती हैं, तब कुछ प्रयास उम्मीद की किरण बनकर सामने आते हैं। ऐसा ही एक भावुक और प्रेरणादायक दृश्य 'उषा फाउंडेशन' द्वारा आयोजित सेवा अभियान में देखने को मिला। फाउंडेशन ने वृद्धजनों के प्रति अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन करते हुए उन्हें केवल सहायता सामग्री ही नहीं दी, बल्कि अपनों जैसा सम्मान और स्नेह भी भेंट किया।
विरासत में मिले सेवा के संस्कार फाउंडेशन के संस्थापक अतुल गुप्ता ने इस अभियान को अपनी पूज्य माता, स्वर्गीय उषा गुप्ता की पावन स्मृति को समर्पित किया। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, "मेरी माता का जीवन करुणा और निस्वार्थ सेवा का पर्याय था। आज हम जो भी सेवा कार्य कर रहे हैं, वह उनके द्वारा बोए गए संस्कारों का ही फल है।" इस अभियान के तहत जरूरतमंद बुज़ुर्गों को कड़ाके की ठंड से बचाने के लिए गरम कपड़े, जूते, दवाइयां और दैनिक उपभोग की आवश्यक वस्तुएं वितरित की गईं।
सामूहिक प्रयास से खिली मुस्कान इस मानवीय मिशन में मंजू गुप्ता, नेहा कुलश्रेष्ठ, मधु श्रीवास्तव और अशोक कुमार गुप्ता सहित नितिन मित्तल व अक्षय अग्रवाल ने कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग किया। टीम के सदस्यों ने केवल सामग्री का वितरण नहीं किया, बल्कि बुज़ुर्गों के पास बैठकर उनके सुख-दुख साझा किए। कई वृद्धजनों की नम आँखों और चेहरों पर झलकता संतोष इस बात का प्रमाण था कि समाज में आज भी आत्मीयता जीवित है।
औपचारिकता नहीं, आत्मीयता है आधार उषा फाउंडेशन के इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता इसकी संवेदनशीलता रही। यहाँ 'दान' को 'कर्तव्य' और 'जरूरतमंद' को 'अमूल्य धरोहर' माना गया। फाउंडेशन का यह निरंतर प्रयास समाज को संदेश देता है कि यदि हमारी सेवा के पीछे नेक नियत और संस्कारों की नींव हो, तो हम एक बेहतर और समावेशी समाज का निर्माण कर सकते हैं। यह अभियान वास्तव में मानवता और सामाजिक जिम्मेदारी का एक उज्ज्वल प्रतीक बनकर उभरा है।
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