डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर बोले यूपीआरटीओयू के कुलपति प्रो. सत्यकाम
प्रयागराज : उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय (UPRTOU), प्रयागराज में महान शिक्षाविद्, प्रखर राष्ट्रचिंतक, कुशल राजनीतिज्ञ और भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती अत्यंत गरिमामयी ढंग से मनाई गई। इस अवसर पर विश्वविद्यालय परिसर में उनके जीवन और कृतित्व पर आधारित एक विशेष व्याख्यान तथा वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) प्रदर्शन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. सत्यकाम ने की।
कार्यक्रम का शुभारंभ 25 मिनट की एक प्रेरक डॉक्यूमेंट्री के प्रदर्शन से हुआ। इस वृत्तचित्र में डॉ. मुखर्जी के जन्म, उच्च शिक्षा, पारिवारिक पृष्ठभूमि, शैक्षणिक उपलब्धियों, उनके राजनीतिक सफर, राष्ट्रहित में लिए गए युगांतरकारी निर्णयों और देश की अखंडता के लिए दिए गए उनके अंतिम बलिदान तक के संपूर्ण जीवन-वृत्त का बेहद प्रभावी और सजीव चित्रण किया गया।
"मातृभाषा में शिक्षा के मूल विचारक थे डॉ. मुखर्जी"
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता, अखंडता और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रबल प्रहरी थे। कुलपति ने वर्तमान परिप्रेक्ष्य का जिक्र करते हुए कहा:
"आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (NEP) में मातृभाषा और भारतीय भाषाओं में शिक्षा देने पर जो विशेष बल दिया जा रहा है, उसकी दूरदर्शी सोच डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने स्वतंत्रता से पहले ही रख दी थी। उनका स्पष्ट मानना था कि अपनी भाषा में दी गई शिक्षा ही ज्ञान को समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचा सकती है।"
प्रो. सत्यकाम ने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि जब देश 'विकसित भारत-2047' के संकल्प की ओर बढ़ रहा है, तब प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर सामाजिक समरसता और कर्तव्यनिष्ठा के साथ देश के विकास में योगदान दे।
अल्पायु में शिक्षा जगत में बनाई विशिष्ट पहचान
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो. सत्यपाल तिवारी ने अपने व्याख्यान में डॉ. मुखर्जी के बौद्धिक चातुर्य की सराहना की। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे, जिन्होंने बहुत ही कम उम्र में कानून (विधि) की उच्च शिक्षा प्राप्त कर शिक्षा-जगत में अपनी एक विशिष्ट और अमिट पहचान बनाई थी। उनका जीवन वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए राष्ट्रभक्ति का सर्वोत्तम मार्गदर्शक है।
विश्वविद्यालय परिवार रहा मौजूद
इससे पहले कार्यक्रम के संयोजक प्रो. छत्रसाल सिंह ने मंचासीन अतिथि विद्वानों का स्वागत किया और डॉ. मुखर्जी के बहुआयामी व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का सफल संचालन प्रो. आनन्दानन्द त्रिपाठी ने किया तथा अंत में डॉ. त्रिविक्रम तिवारी ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस वैचारिक आयोजन के अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलसचिव, वित्त अधिकारी, विभिन्न विद्याशाखाओं के निदेशक, प्रभारी निदेशक, आचार्य, सह-आचार्य, कर्मचारी और बड़ी संख्या में शोधार्थी व छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
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