वैश्विक संकटों का समाधान है 'अद्वैत' दर्शन, 'जीरो-सम गेम' छोड़नी होगी मानसिकता: विदेश मंत्री एस. जयशंकर
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने चिन्मय अमृत महोत्सव में कहा कि वैश्विक शांति के लिए 'अद्वैत' का दर्शन जरूरी है। दुनिया को 'जीरो-सम गेम' त्यागकर कूटनीति और संवाद का रास्ता चुनना होगा।
नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र दिवस के उपलक्ष्य में नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में आयोजित 'चिन्मय अमृत महोत्सव ग्लोबल सम्मेलन' के दौरान भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने वैश्विक शांति, कूटनीति और भारत के अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण को बहुत ही स्पष्ट शब्दों में दुनिया के सामने रखा। सम्मेलन का मुख्य विषय 'अद्वैत' (एक ही वास्तविकता) था, जिस पर विचार व्यक्त करते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि भारतीय दर्शन का 'अद्वैत' सिद्धांत आज के दौर में वैश्विक संकटों को समाप्त करने का सबसे प्रभावी मार्ग है।
विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान के अनुसार, डॉ. जयशंकर ने इस बात पर विशेष बल दिया कि 'अद्वैत' का दर्शन हमें 'जीरो-सम गेम' (जिसमें एक देश का लाभ दूसरे का नुकसान माना जाता है) की पुरानी और संकीर्ण मानसिकता को पूरी तरह त्यागने की सीख देता है। उन्होंने कहा कि आज की विभाजित दुनिया में देशों को सामूहिक, साझा और सामान्य हितों की रक्षा के लिए अपनी आंतरिक एकता और सह-अस्तित्व की भावना पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
विश्व स्तर पर चल रहे मौजूदा युद्धों और तनावपूर्ण स्थितियों का उल्लेख करते हुए विदेश मंत्री ने स्पष्ट चेतावनी दी कि 'शांति अविभाज्य है'। दुनिया के किसी भी एक हिस्से में पनपने वाली अशांति केवल उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरी दुनिया की स्थिरता के लिए खतरा बन जाती है। उन्होंने भारत के रुख को दोहराते हुए कहा कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय विवाद का स्थायी समाधान केवल 'बातचीत और कूटनीति' से ही संभव है।
अपने संबोधन में डॉ. जयशंकर ने वैश्विक संस्थाओं में सुधारों की पुरजोर वकालत की। उन्होंने कहा कि वैश्विक संकटों के समय अंतरराष्ट्रीय निकायों को मूकदर्शक बनकर किनारे नहीं बैठे रहना चाहिए। इसके साथ ही, आतंकवाद और समकालीन चुनौतियों का सामना करने के लिए पूरी दुनिया से एकजुट होकर कड़ा रुख अपनाने का आह्वान किया। चिन्मय मिशन की 75वीं वर्षगांठ पर आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में यूएन रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर स्टीफन प्रीसनर समेत कई प्रमुख हस्तियां उपस्थित थीं।
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