भारतीय लोकसंस्कृति और आयुर्वेद में ऋतु अनुसार आहार-विहार का महत्व

भारतीय लोकसंस्कृति और आयुर्वेद का सम्बंध बहुत गहरा है। सदियों से हमारे समाज में ऋतुचर्या और आहार-विहार को दोहों, चौपाइयों और कहावतों के माध्यम से जन-सामान्य तक पहुँचाया जाता रहा है।

Aug 04, 2026 - 22:16
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भारतीय लोकसंस्कृति और आयुर्वेद में ऋतु अनुसार आहार-विहार का महत्व

भारतीय लोकसंस्कृति में ऋतुओं के अनुसार आहार-विहार का उल्लेख अनेक दोहों और कहावतों में मिलता है। प्रस्तुत दोहा न केवल लोकज्ञान का प्रतीक है, बल्कि यह आयुर्वेद के ऋतुचर्या सिद्धांत से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। इसमें यह बताया गया है कि प्रत्येक ऋतु में कौन-से आहार-विहार को अपनाना या त्यागना चाहिए ताकि स्वास्थ्य सुरक्षित बना रहे।

#लोकोक्ति:
चैते गुड़ बैसाखे तेल,
जेठे पथ्य असाढ़े बेल।
सावन साग न भादों दही,
क्वार करेला न कार्तिक मही।।
अगहन जीरा पूसे घना,
माघे मिश्री फागुन चना।
ई बारह जो देय बचाय,
वहिं घर वैद कबौं न जाय।।

यह लोकोक्ति वर्ष की 12 महीनों में कुछ आहार और जीवनशैली से बचने की सलाह देता है। यह परंपरागत अनुभव और ऋतु-अनुकूलता पर आधारित है।

#आयुर्वेदिक_विश्लेषण (ऋतुचर्या के संदर्भ में):
आयुर्वेद में वर्ष को छह ऋतुओं में विभाजित किया गया है और प्रत्येक ऋतु में विशेष आहार-विहार की संस्तुति दी गई है ताकि दोषों का संतुलन बना रहे। इस दोहे की सिफारिशें उसी के अनुरूप हैं।

1. #चैत्र (वसंत ऋतु) – गुड़ न खाएं
श्लोक: “वसन्ते कफवृद्धिः स्यात्, तिक्तं कषायमादरेत्।”
(चरक संहिता, सूत्रस्थान 6.22)
अर्थ: वसंत ऋतु में शरीर में कफ दोष की वृद्धि होती है। इसलिए तिक्त (कड़वे) और कषाय (कसैले) रस का सेवन करना चाहिए।
गुड़ का गुण:
“गुडं गुरु स्निग्धं वृष्यं कफपित्तास्रवर्धनम्।”
(भावप्रकाश निघंटु, मधुर वर्ग)
अर्थ: गुड़ भारी, स्निग्ध और कफवर्धक होता है। इसलिए चैत्र मास में इसका त्याग करना स्वास्थ्यकर होता है।

2. #वैशाख (ग्रीष्म ऋतु) – तेल न खाएं
श्लोक: “गुणशीतलाहारः ग्रीष्मे हितः।”
(चरक संहिता, सूत्रस्थान 6.23)
अर्थ: ग्रीष्म ऋतु में शरीर की अग्नि मंद हो जाती है, अतः ठंडे और हल्के आहार का सेवन हितकारी होता है।
तेल का गुण:
“स्नेहाः पित्तवर्धनाः।”
(अष्टांग हृदय, सूत्रस्थान 5.33)
अर्थ: तेलयुक्त पदार्थ पित्त को बढ़ाते हैं और ग्रीष्म में यह हानिकारक हो सकता है।

3. #ज्येष्ठ– यात्रा न करें
श्लोक: “श्रमकारिणं जन्तुं ग्रीष्मे आतपवर्जितम्।”
(सुश्रुत संहिता, सूत्रस्थान 6.24)
अर्थ: जेठ की गर्मी में अधिक परिश्रम और धूप में निकलना वर्जित है, क्योंकि इससे पित्त और जलन की वृद्धि होती है।

4. #आषाढ़ – बेल न खाएं
श्लोक: “वर्षास्वनिलमाकाशं दोषा हरन्ति मन्दाग्नयः।”
(चरक संहिता, सूत्रस्थान 6.25)
अर्थ: वर्षा ऋतु में पाचन अग्नि मंद होती है और दोष असंतुलित हो जाते हैं। बेल जैसे भारी पदार्थ इस समय वर्जित हैं।
बेल का गुण: गुरु, शीतल, मन्दपाक।

5. #श्रावण– साग न खाएं
श्लोक: “वर्षासु रुक्षोष्णसिद्धं भोजनं हितमिष्यते।”
(अष्टांग हृदय, सूत्रस्थान 4.26)
अर्थ: वर्षा ऋतु में सूखा, गर्म और अच्छी तरह से पकाया गया भोजन हितकारी होता है। साग में कीटाणुओं की आशंका अधिक होती है।
साग का गुण:
“सागानि गुरु श्लेष्मलानि च।”
(भावप्रकाश निघंटु, हरित वर्ग)

6. #भाद्रपद– दही वर्जित
श्लोक: “दधि श्लेष्मलमग्न्यं च न नक्तं न ग्रीष्मगे।”
(चरक संहिता, सूत्रस्थान 7.61)
अर्थ: दही कफवर्धक और अग्नि को मंद करने वाला है। यह ग्रीष्म और वर्षा ऋतु में नहीं खाना चाहिए।

7. #आश्विन-  करेला न खाएं
श्लोक: “शरदि तिक्तं कषायं च, लघु शीतं प्रशस्यते।”
(चरक संहिता, सूत्रस्थान 6.31)
अर्थ: शरद ऋतु में लघु, शीतल और मधुर आहार उपयुक्त है, न कि अधिक तिक्त (कड़वा) क्योंकि वह पित्त को भड़काता है।
करेले का गुण: उष्ण, तिक्त, पित्तवर्धक।

8. #कार्तिक – मही (मट्ठा) न पिएं
श्लोक: “हेमन्ते गुरु स्निग्धं च पायसान्नं हितं स्मृतम्।”
(चरक संहिता, सूत्रस्थान 6.33)
अर्थ: शीत ऋतु के प्रारंभ में भारी और स्निग्ध भोजन हितकारी होता है। मट्ठा हल्का और ठंडा होता है, इसलिए त्याज्य है।

9. #मार्गशीर्ष- जीरा न खाएं
श्लोक: “हेमन्ते बलवृद्धिः स्यात् अग्निः तीव्रो भवत्यपि।”
(सुश्रुत संहिता, सूत्रस्थान 6.28)
अर्थ: इस समय पाचन अग्नि तीव्र होती है। जीरा जैसे तीक्ष्ण और उष्ण द्रव्य पित्त को अधिक बढ़ा सकते हैं।
जीरे का गुण:
“जीरकं दीपनीयं, पित्तं च करोति।”
(भावप्रकाश निघंटु)

10. #पौष– घना (धनिया) न खाएं
श्लोक: “शिशिरे वातकफो वृद्धिं प्राप्नोति तेन रुक्षणम्।”
(चरक संहिता, सूत्रस्थान 6.34)
अर्थ: ठंड के मौसम में कफ और वात की वृद्धि होती है। धनिया शीतल और कफवर्धक है, इसलिए इसे सीमित करें।

11. #माघ – मिश्री न खाएं
श्लोक: “मधुरं शीतलं स्निग्धं कफवर्धनमिष्यते।”
(सुश्रुत संहिता, सूत्रस्थान 46.520)
अर्थ: मिश्री शीतल और मधुर होने के कारण शीत ऋतु में कफ बढ़ा सकती है। अतः सावधानी आवश्यक है।

12. #फाल्गुन– चना वर्जित
श्लोक: “शिशिरे वातवृद्धिः स्यात्, लघुं स्निग्धं समाचरेत्।”
(चरक संहिता, सूत्रस्थान 6.35)
अर्थ: चना गुरु और वातवर्धक होता है, जो इस ऋतु में हानिकारक हो सकता है।
चना का गुण:
“चणकः रुक्षो वातलः।”
(भावप्रकाश, धान्य वर्ग)

#आधुनिक_वैज्ञानिक_शोध_और_प्रासंगिकता:
1. सीज़नल इम्युनिटी पैटर्न:
National Institute of Immunology की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, मौसम के अनुसार आहार-विहार अपनाना प्रतिरक्षा प्रणाली को संतुलित रखने में सहायक होता है।

2. गर्मी में तेलयुक्त आहार से लू का खतरा:
WHO द्वारा 2018 में प्रकाशित “Heat and Health” गाइडलाइन में अत्यधिक वसायुक्त भोजन से बचने की सलाह दी गई है।

3. मानसून में हरी सब्जियों का परहेज:
ICMR (2020) की रिपोर्ट के अनुसार, मानसून में leafy vegetables में बैक्टीरियल संक्रमण की संभावना अधिक होती है।

4. दही का प्रयोग मानसून में हानिकारक:
Clinical Nutrition Journal (2021) के एक अध्ययन में पाया गया कि आर्द्र मौसम में दही के सेवन से जठराग्नि मंद होती है और कफजन्य रोग

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प्रोफेसर अविनाश चन्द्र श्रीवास्तव।

प्राचार्य- गोयल आयुर्वेदिक मेडिकल कालेज लखनऊ।

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