शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की जयंती पर विशेष
शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का जीवन केवल 23 वर्षों का रहा, लेकिन उनके विचार, अध्ययन, क्रांतिकारी संघर्ष और अमर बलिदान ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सदा के लिए अमर बना दिया।
(अमर नाथ तिवारी)
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल राजनीतिक आंदोलनों और युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह उन असंख्य वीरों के त्याग, संघर्ष, साहस और बलिदान की कहानी भी है जिन्होंने अपने जीवन की सुख-सुविधाओं को छोड़कर देश की स्वतंत्रता को अपना सर्वोच्च लक्ष्य बनाया। इन्हीं महान क्रांतिकारियों में शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका जीवन केवल लगभग 23 वर्षों का रहा, लेकिन इतने छोटे जीवन में उन्होंने जिस प्रकार अध्ययन किया, अपने विचार विकसित किए, युवाओं को संगठित किया, ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष किया और अंततः हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को स्वीकार किया, उसने उन्हें भारतीय इतिहास में अमर बना दिया।
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को तत्कालीन लायलपुर जिले के बंगा गाँव में हुआ था, जो वर्तमान में पाकिस्तान के फैसलाबाद क्षेत्र में स्थित है। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव के अभिलेख में भी उनका जन्म 28 सितंबर 1907 को बंगा में बताया गया है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था। उनका परिवार पहले से ही देश की स्वतंत्रता के आंदोलन से प्रभावित था। उनके चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह भी ब्रिटिश शासन के विरोध में सक्रिय रहे थे। इसलिए भगत सिंह को बचपन से ही ऐसा पारिवारिक वातावरण मिला जिसमें देश, समाज और स्वतंत्रता की बातें उनके आसपास होती रहती थीं।
बचपन से ही भगत सिंह के भीतर देश के प्रति गहरा लगाव दिखाई देने लगा था। वे अपने आसपास होने वाली राजनीतिक घटनाओं को सामान्य बालक की तरह केवल सुनकर भूल नहीं जाते थे, बल्कि उनके बारे में सोचते थे। उनके परिवार में स्वतंत्रता की भावना पहले से मौजूद थी और इसी कारण उनके व्यक्तित्व पर बचपन से ही देशभक्ति का प्रभाव पड़ा। आगे चलकर यही भावना उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य बन गई।
भगत सिंह ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बंगा के प्राथमिक विद्यालय से प्राप्त की। इसके बाद वे लाहौर आए और आगे की शिक्षा प्राप्त की। लाहौर उस समय पंजाब की राजनीतिक और बौद्धिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। वहाँ का वातावरण उनके विचारों के विकास में सहायक बना। उन्होंने केवल पाठ्यक्रम की पुस्तकों को पढ़ने तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र, साहित्य और समाज से जुड़ी पुस्तकों का अध्ययन करना शुरू किया। सरकारी अभिलेखों के अनुसार, वे आगे चलकर जेल में भी पुस्तकों और समाचार-पत्रों की मांग करते रहे और अपने कारावास के दौरान काफी अध्ययन तथा लेखन किया।
भगत सिंह के जीवन पर 1919 का जलियांवाला बाग हत्याकांड भी गहरा प्रभाव डालने वाली घटनाओं में शामिल था। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियां वाला बाग में जनरल डायर के आदेश पर निहत्थी भीड़ पर गोलियाँ चलवाई गईं। इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया। उस समय भगत सिंह बहुत कम उम्र के थे, लेकिन देश की राजनीतिक परिस्थितियों के प्रति उनकी जागरूकता तेजी से बढ़ रही थी। जलियांवाला बाग की घटना ने ब्रिटिश शासन के चरित्र के बारे में उनके विचारों को और कठोर बनाया और उनके भीतर स्वतंत्रता की भावना को मजबूत किया।
उस समय भारत में महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन भी चल रहा था। देश के लाखों लोगों की तरह भगत सिंह भी इस आंदोलन से प्रभावित हुए। उन्होंने समझा कि भारत को विदेशी शासन से मुक्त कराने के लिए जनता को जागरूक और संगठित करना आवश्यक है। हालांकि आगे चलकर उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के तरीकों के बारे में अलग विचार विकसित किए और क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ गए।
युवावस्था में भगत सिंह का जीवन पूरी तरह बदलने लगा। वे विवाह और व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की अपेक्षा देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समर्पित करना चाहते थे। जब उनके परिवार में उनके विवाह की चर्चा हुई तो वे घर छोड़कर चले गए। इसके बाद वे कानपुर पहुँचे। वहाँ उनका संपर्क प्रसिद्ध राष्ट्रवादी पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी से हुआ। भगत सिंह ने पत्रका रिता के माध्यम से भी अपने विचारों को लोगों तक पहुँचाने का प्रयास किया। उन्होंने अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखे और कुछ स्थानों पर उपनामों का इस्तेमाल किया। भारत सरकार के अभिलेखों में उनके ‘बलवंत’ नाम से लिखने तथा ‘प्रताप’ सहित पत्र-पत्रिकाओं में लेखन का उल्लेख मिलता है।
भगत सिंह केवल हथियार उठाने वाले क्रांतिकारी नहीं थे। वे एक गंभीर पाठक और लेखक भी थे। वे इतिहास से सीखने में विश्वास रखते थे। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ विश्व के विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों का अध्ययन किया। साहित्य, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और इतिहास में उनकी रुचि थी। उनके जेल जीवन के दौरान लिखे गए पत्र और लेख उनके विचारशील व्यक्तित्व को समझने के महत्वपूर्ण साधन हैं।
1926 में लाहौर में नौजवान भारत सभा के गठन में भगत सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस संगठन का उद्देश्य युवाओं को जागरूक करना और उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ना था। भगत सिंह चाहते थे कि देश का युवा केवल भावनाओं में बहकर नहीं बल्कि इतिहास, राजनीति और सामाजिक परिस्थितियों को समझकर आगे बढ़े। वे सांप्रदायिकता और सामाजिक विभाजन के विरोधी थे तथा युवाओं को एक व्यापक राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए संगठित करने का प्रयास करते थे।
1928 में क्रांतिकारी आंदोलन के भीतर भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का पुनर्गठन करके हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन यानी HSRA का गठन किया गया। भगत सिंह इस क्रांतिकारी संगठन से जुड़े प्रमुख युवाओं में थे। संगठन के नाम में समाजवादी विचारधारा को शामिल करना इस बात का संकेत था कि उनके चिंतन में राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और आर्थिक प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो चुके थे।
इसी समय ब्रिटिश सरकार ने भारत में साइमन कमीशन भेजा। इस आयोग में कोई भारतीय सदस्य नहीं था, जिसके कारण देशभर में इसका विरोध हुआ। पंजाब में इस विरोध का नेतृत्व लाला लाजपत राय जैसे प्रमुख नेता कर रहे थे। 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए। कुछ समय बाद 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई।
लाला लाजपत राय की मृत्यु ने भगत सिंह और उनके साथियों को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने इसे ब्रिटिश दमन का परिणाम माना। इसके बाद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु और सुखदेव सहित उनके साथियों ने पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट को निशाना बनाने की योजना बनाई। लेकिन 17 दिसंबर 1928 को पहचान में हुई गलती के कारण सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पी. सॉन्डर्स की हत्या हो गई। भारत सरकार के अभिलेख भी इस घटना को स्कॉट को निशाना बनाने की योजना से जुड़ी पहचान की गलती के रूप में दर्ज करते हैं।
सॉन्डर्स की हत्या के बाद भगत सिंह और उनके साथी भूमिगत हो गए। भगत सिंह ने पुलिस से बचने के लिए अपना रूप बदल लिया। उन्होंने अपने बाल कटवाए और दाढ़ी-मूंछ का रूप भी बदला। उस समय यह उनके लिए व्यक्तिगत और सांस्कृतिक रूप से बड़ा परिवर्तन था, लेकिन उन्होंने इसे अपने क्रांतिकारी उद्देश्य के लिए स्वीकार किया। वे लाहौर से निकलने में सफल रहे और कुछ समय तक अलग-अलग स्थानों पर रहे।
इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार भगत सिंह और उनके साथियों की तलाश में अधिक सक्रिय हो गई। दूसरी ओर भगत सिंह और उनके साथी अपने आंदोलन को केवल गुप्त कार्रवाइयों तक सीमित नहीं रखना चाहते थे। वे चाहते थे कि उनके विचार जनता तक पहुँचें और ब्रिटिश सरकार को यह महसूस हो कि भारत के युवा अब राजनीतिक रूप से जागरूक हो चुके हैं।
1929 में ब्रिटिश सरकार द्वारा लाए जा रहे ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल और पब्लिक सेफ्टी बिल का क्रांतिकारियों ने विरोध किया। इसी पृष्ठभूमि में केंद्रीय विधान सभा में बम फेंकने की योजना बनाई गई। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केंद्रीय विधान सभा में बम फेंका। इसके बाद दोनों ने भागने की कोशिश नहीं की, बल्कि वहीं गिरफ्तार हो गए। भारत सरकार के अभिलेखों के अनुसार, उनकी संयुक्त अदालत में दी गई सफाई में यह कहा गया कि उनका उद्देश्य लोगों को नुकसान पहुँचाना नहीं बल्कि अपनी राजनीतिक बात को सुनाना था। उन्होंने अपनी कार्रवाई को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विरोध के रूप में प्रस्तुत किया।
केंद्रीय विधान सभा की घटना के बाद भगत सिंह की गिरफ्तारी ने उन्हें पूरे देश में चर्चित कर दिया। उनकी तस्वीरें और उनके विचार लोगों तक पहुँचने लगे। उनका प्रसिद्ध टोपी वाला चित्र भी इसी दौर में लिया गया था। 1929 में दिल्ली के कश्मीरी गेट स्थित एक स्टूडियो में उनकी यह तस्वीर खींची गई थी। उस समय वे लगभग 21 वर्ष के थे। बाद में यही तस्वीर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रसिद्ध प्रतीकों में से एक बन गई।
गिरफ्तारी के बाद भगत सिंह और उनके साथियों को अलग-अलग जेलों में रखा गया। जेल में उन्हें भारतीय और यूरोपीय कैदियों के बीच होने वाले भेदभाव का सामना करना पड़ा। राजनीतिक कैदियों के साथ बेहतर व्यवहार, उचित भोजन, कपड़े, पुस्तकें,समाचार-पत्र और अन्य सुविधाओं की मांग को लेकर उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की। जून 1929 में शुरू हुई इस भूख हड़ताल ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। उनकी मांगों में पुस्तकों और लिखने की सामग्री तथा राजनीतिक कैदियों के लिए समाचार-पत्र की उपलब्धता भी शामिल थी।
इस भूख हड़ताल के दौरान उनके साथी जतिन दास ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लंबी भूख हड़ताल के बाद सितंबर 1929 में उनका निधन हो गया। जतिन दास की मृत्यु ने पूरे देश में गहरा प्रभाव डाला। उनके अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। इससे जेल में राजनीतिक कैदियों की स्थिति और ब्रिटिश सरकार की नीतियों पर देशव्यापी चर्चा हुई।
जेल में भगत सिंह ने अपने अध्ययन को जारी रखा। उनके लिए जेल केवल बंदीगृह नहीं था, बल्कि वह पढ़ने और विचार करने का स्थान भी बन गया था। वे लगातार किताबें मंगाते थे। उन्होंने इतिहास, राजनीति,अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और साहित्य से जुड़ी अनेक पुस्तकों का अध्ययन किया। एक पत्र में उन्होंने जेल से अपने मित्र जयदेव गुप्ता के माध्यम से अनेक पुस्तकों की मांग की थी। सरकारी अभिलेखों में भी उनके व्यापक अध्ययन और पुस्तक-प्रेम का उल्लेख मिलता है।
भगत सिंह का लेखन उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। उन्होंने अपने समय के राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों पर गंभीरता से विचार किया। उनके लेखों में स्वतंत्रता, क्रांति, धर्म, समाज, मजदूरों और किसानों की स्थिति, आर्थिक असमानता और राजनीतिक व्यवस्था जैसे विषय दिखाई देते हैं। उनका प्रसिद्ध लेख “मैं नास्तिक क्यों हूँ” उनके व्यक्तिगत वैचारिक चिंतन को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने तर्क, अध्ययन और विचार के आधार पर अपने दृष्टिकोण को सामने रखा।
उनके लिए क्रांति का अर्थ केवल हिंसक कार्रवाई नहीं था। केंद्रीय विधान सभा मामले में दिए गए उनके संयुक्त बयान में उन्होंने ‘क्रांति’ को वर्तमान अन्यायपूर्ण व्यवस्था में परिवर्तन से भी जोड़ा था। उन्होंने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि क्रांति का अर्थ हमेशा केवल रक्तपात नहीं होता, बल्कि समाज और व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन भी हो सकता है।
इसी दौरान सॉन्डर्स हत्या मामले में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु पर लाहौर षड्यंत्र मामले के अंतर्गत मुकदमा चला। ब्रिटिश सरकार ने इस मामले की सुनवाई विशेष न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से की। मुकदमे के दौरान भगत सिंह और उनके साथियों ने अदालत को भी अपने विचार जनता तक पहुँचाने का माध्यम बनाया। वे केवल अपनी व्यक्तिगत सजा से चिंतित नहीं थे, बल्कि वे अपने राजनीतिक विचारों को देशवासियों तक पहुँचाना चाहते थे।
मुकदमे की प्रक्रिया आगे बढ़ती गई और अंततः भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को मृत्युदंड दिया गया। इस निर्णय के बाद देशभर में उनकी सजा कम करने की मांग उठी। उनके परिवार और अनेक लोगों ने ब्रिटिश सरकार से दया या सजा में परिवर्तन की अपील की। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने मृत्युदंड को नहीं बदला।
भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह ने भी अपने बेटे की सजा को लेकर अपील की थी। भगत सिंह ने अपने पिता के इस प्रयास पर असहमति व्यक्त की। 4 अक्टूबर 1930 के उनके पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपने साथियों से अलग होकर व्यक्तिगत रूप से बचने का प्रयास नहीं करना चाहते थे। सरकारी अभिलेखों में उनके इस पत्र का उल्लेख मिलता है और यह उनके सिद्धांतों के प्रति दृढ़ रुख को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है।
भगत सिंह अपने अंतिम दिनों में भी पढ़ते और लिखते रहे। वे अपने परिवार और साथियों को पत्र लिखते रहे। उन्होंने अपने जीवन, संघर्ष और भविष्य के भारत को लेकर विचार व्यक्त किए। उनकी उम्र उस समय बहुत कम थी, लेकिन उनके विचारों में राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों को लेकर गंभीरता दिखाई देती थी।
उनके अंतिम समय को लेकर अनेक संस्मरण और लोकप्रिय कथाएँ प्रचलित हैं। इतना ऐतिहासिक रूप से स्पष्ट है कि 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दी गई। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव के अभिलेखों में भी 23 मार्च 1931 को तीनों की फाँसी का उल्लेख मिलता है। इसी कारण 23 मार्च को शहीद दिवस के रूप में याद किया जाता है।
भगत सिंह की शहादत की खबर पूरे देश में तेजी से फैली। उनके बलिदान ने भारतीय जनता और विशेष रूप से युवाओं पर गहरा प्रभाव डाला। उनकी तस्वीरें, उनके लेख और उनके विचार लोगों के बीच पहुँचने लगे। वे स्वतंत्रता आंदोलन में साहस और बलिदान के प्रतीक बन गए।
भगत सिंह का जीवन केवल अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे युवा की कहानी है जिसने अपने आसपास की परिस्थितियों को समझने का प्रयास किया, पुस्तकों को अपना साथी बनाया, राजनीतिक विचारों पर गंभीरता से चिंतन किया, युवाओं को संगठित करने का प्रयास किया और अपने विचारों के लिए कठिन परिस्थितियों का सामना किया। उनका व्यक्तित्व क्रांतिकारी गतिविधियों के साथ-साथ अध्ययन और लेखन से भी निर्मित हुआ था।
उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उनका अध्ययनशील स्वभाव था। वे जेल में भी किताबों के लिए लगातार प्रयास करते रहे। उनके लिए ज्ञान केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं था, बल्कि समाज को समझने और बदलने का माध्यम भी था। उनके पत्रों और लेखों से पता चलता है कि वे अपने समय के राजनीतिक प्रश्नों को गहराई से समझना चाहते थे।
भगत सिंह के जीवन में उनके साथी भी महत्वपूर्ण थे। सुखदेव उनके निकट सहयोगियों में थे, राजगुरु उनके साथ क्रांतिकारी गतिविधियों में जुड़े थे, चंद्रशेखर आजाद संगठन के प्रमुख नेताओं में थे और बटुकेश्वर दत्त के साथ उन्होंने केंद्रीय विधान सभा की घटना में भाग लिया। इन सभी साथियों के साथ उनका संबंध उस व्यापक क्रांतिकारी आंदोलन का हिस्सा था जिसमें अनेक युवाओं ने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी।
भगत सिंह का जीवन यह भी दिखाता है कि स्वतंत्रता आंदोलन कई अलग-अलग धाराओं से मिलकर बना था। एक ओर अहिंसक जन आंदोलनों की धारा थी, वहीं दूसरी ओर क्रांतिकारी संगठन भी सक्रिय थे। भगत सिंह इसी क्रांतिकारी धारा के प्रमुख चेहरों में से एक बने। उनके विचारों और तरीकों पर उस समय भी चर्चा और मतभेद थे,लेकिन उनके जीवन और शहादत का ऐतिहासिक प्रभाव निर्विवाद रूप से बहुत व्यापक रहा।
उनका प्रसिद्ध नारा “इंकलाब जिंदाबाद” स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान व्यापक रूप से लोकप्रिय हुआ। यह नारा केवल एक व्यक्ति की पहचान नहीं रहा, बल्कि उस दौर के क्रांतिकारी युवाओं की आवाज बन गया। भगत सिंह ने अपने लेखन और वक्तव्यों के माध्यम से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि परिवर्तन केवल शासन बदलने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज में न्याय और समानता की दिशा में भी होना चाहिए।
उनके विचारों में मजदूरों और किसानों की स्थिति का प्रश्न भी महत्वपूर्ण था। वे आर्थिक शोषण और सामाजिक असमानता को गंभीर समस्या मानते थे। वे ऐसा भारत देखना चाहते थे जिसमें जनता को अधिक अधिकार और सम्मान मिले। इसलिए उनके व्यक्तित्व को केवल एक युवा क्रांतिकारी के रूप में देखना उनके विचारों के व्यापक पक्ष को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है।
23 वर्ष की आयु में उनका जीवन समाप्त हो गया, लेकिन उनके विचार और उनकी स्मृति समाप्त नहीं हुई। स्वतंत्र भारत में भी उनके जीवन पर अनेक पुस्तकें लिखी गईं, शोध हुए,फिल्मों और नाटकों के माध्यम से उनकी कहानी लोगों तक पहुँची और उनके नाम पर अनेक संस्थानों तथा स्थानों का नाम रखा गया। उनकी प्रसिद्ध तस्वीर आज भी भारतीय जनमानस में स्वतंत्रता संघर्ष की पहचान के रूप में देखी जाती है। भारत सरकार के अभिलेख भी बताते हैं कि उनकी तस्वीर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान प्रेरणा का महत्वपूर्ण प्रतीक बनी और बाद में भारतीय लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गई।
आज भगत सिंह को याद करना केवल उनके जन्मदिन या शहीद दिवस तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनके जीवन को समझने के लिए उनके संघर्ष के साथ-साथ उनके अध्ययन, लेखन, पत्रों और राजनीतिक विचारों को भी पढ़ना आवश्यक है। उन्होंने जिस उम्र में जीवन के बड़े निर्णय लिए, उसी उम्र में वे लगातार पढ़ रहे थे, लिख रहे थे और अपने समय की समस्याओं पर विचार कर रहे थे।
उनकी जीवनगाथा हमें यह भी बताती है कि इतिहास केवल बड़े नेताओं की कहानी नहीं होता। इतिहास में युवा भी अपनी भूमिका निभाते हैं और कभी-कभी उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों की सोच को प्रभावित करता है। भगत सिंह ने अपने छोटे से जीवन में ऐसा प्रभाव छोड़ा जो उनकी मृत्यु के बाद भी लगातार बना रहा।
शहीद भगत सिंह का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहाँ देश की स्वतंत्रता की भावना पहले से मौजूद थी। बचपन में उन्होंने देश की राजनीतिक परिस्थितियों को समझना शुरू किया। जलियांवाला बाग की घटना और स्वतंत्रता आंदोलन की अन्य घटनाओं ने उनके मन को प्रभावित किया। युवावस्था में वे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े, नौजवान भारत सभा के माध्यम से युवाओं को संगठित किया,HSRA से जुड़े, लाला लाजपत राय की मृत्यु के बाद सॉन्डर्स की हत्या की घटना में शामिल हुए, केंद्रीय विधान सभा में बटुकेश्वर दत्त के साथ बम फेंकने के बाद गिरफ्तारी दी, जेल में भूख हड़ताल की,अध्ययन और लेखन जारी रखा और अंततः लाहौर षड्यंत्र मामले में मृत्युदंड प्राप्त किया।
23 मार्च 1931 को जब उनका जीवन समाप्त हुआ, तब उनकी आयु केवल लगभग 23 वर्ष थी। इतनी कम उम्र में उनका जीवन समाप्त हो गया, लेकिन उनका नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में स्थायी रूप से दर्ज हो गया। राजगुरु और सुखदेव के साथ उनकी शहादत को आज भी पूरे देश में श्रद्धा के साथ याद किया जाता है।
भगत सिंह का जीवन भारतीय इतिहास की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है जिसने गुलामी को स्वीकार करने से इनकार किया। उन्होंने अपने समय की राजनीतिक परिस्थितियों को समझा,अपने विचार विकसित किए और अपने विश्वासों के अनुसार जीवन जिया। उनके जीवन में साहस था, लेकिन उसके साथ अध्ययन और विचार की शक्ति भी थी। यही कारण है कि भगत सिंह केवल एक क्रांतिकारी के रूप में नहीं, बल्कि एक युवा विचारक, लेखक और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भी इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
आज भी जब भगत सिंह का नाम लिया जाता है तो उनके साथ साहस, त्याग, अध्ययन, संघर्ष और देश के लिए बलिदान की भावना जुड़ जाती है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। उनकी शहादत यह स्मरण कराती है कि भारत की स्वतंत्रता अनेक ज्ञात और अज्ञात लोगों के लंबे संघर्ष और बलिदान से प्राप्त हुई थी।
शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का नाम इसलिए भारतीय इतिहास में सदैव सम्मान और स्मरण के साथ लिया जाता रहेगा।
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