13 साल का इंतज़ार खत्म: बिरला फर्टिलिटी एंड आईवीएफ गोरखपुर में 'प्रिसिजन मेडिसिन' से गूँजी किलकारी
बिरला फर्टिलिटी गोरखपुर में 13 साल के इंतजार के बाद दंपत्ति को मिली सफलता; आधुनिक तकनीक से मिली नई ज़िंदगी।
गोरखपुर: संतान सुख की चाह में 13 साल का लंबा संघर्ष और 5 बार मिली असफलता किसी भी दंपत्ति को तोड़ सकती है। लेकिन गोरखपुर की रहने वाली 33 वर्षीय आशा और उनके पति मनीष (नाम परिवर्तित) के लिए धैर्य और आधुनिक तकनीक का संगम वरदान साबित हुआ। बिरला फर्टिलिटी एंड आईवीएफ, गोरखपुर में सटीक और व्यक्तिगत उपचार (Personalised Care) की बदौलत इस दंपत्ति ने अपने पहले ही प्रयास में सफलता हासिल की।
विफलता के चक्र को विज्ञान से तोड़ा
आशा और मनीष इससे पहले दो बार आईयूआई और तीन बार आईवीएफ करा चुके थे। जटिल सर्जरी और एएमएच (AMH) स्तर मात्र 0.16 होने के कारण गर्भधारण लगभग असंभव लग रहा था। जब वे डॉ. आकृति गुप्ता (सेंटर हेड और कंसल्टेंट) से मिले, तो उपचार का तरीका बदला गया। डॉ. गुप्ता ने 'संख्या' के बजाय 'सटीकता' पर जोर दिया।
सफलता के पीछे के तीन बड़े कारण:
माइक्रोफ्लुइडिक्स तकनीक: पति के कम शुक्राणु होने के बावजूद इस तकनीक से सबसे बेहतर गुणवत्ता वाले शुक्राणुओं का चयन किया गया।
जेनेटिक टेस्टिंग (PGT): भ्रूण को गर्भाशय में डालने से पहले उसकी आनुवंशिक जांच की गई ताकि किसी भी विकार की संभावना न रहे।
ईआरए (ERA) टेस्ट: सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब जांच में पता चला कि आशा का 'विंडो ऑफ इम्प्लांटेशन' सामान्य 102 घंटों के बजाय 108 घंटों पर शिफ्ट हो गया था।
डॉ. आकृति गुप्ता ने बताया, "इस मामले में सफलता का राज़ उपचार की तीव्रता में नहीं, बल्कि सही समय (Timing) और बारीकियों को समझने में था। जब हमने भ्रूण स्थानांतरण को महिला के व्यक्तिगत जैविक समय के अनुसार किया, तो नतीजे सकारात्मक रहे।"
बिरला फर्टिलिटी एंड आईवीएफ की इस उपलब्धि ने साबित कर दिया है कि यदि सही तकनीक और अनुभवी डॉक्टरों का साथ मिले, तो सालों पुरानी बांझपन की समस्या का भी समाधान संभव है।
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