प्रकृति की प्यारी चहक को बचाने का संकल्प: 'गौरैया बचाओ' आंदोलन में डॉ. विजय की अपील

Mar 20, 2026 - 21:15
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प्रकृति की प्यारी चहक को बचाने का संकल्प: 'गौरैया बचाओ' आंदोलन में डॉ. विजय की अपील

कुंडा, प्रतापगढ़ : विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर, प्रतापगढ़ के मानिकपुर में 'मां ज्वालामुखी देवी मंदिर ट्रस्ट' द्वारा एक भव्य जन-जागरूकता रैली और सभा का आयोजन किया गया, जिसका उद्देश्य विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुकी नन्हीं गौरैया के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करना था। इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण 'गौरैया बचाओ' जुलूस रहा, जिसने गाँव की गलियों को सकारात्मक ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण के नारों से गुंजायमान कर दिया।

रैली का नेतृत्व करते हुए, मां ज्वालामुखी देवी मंदिर ट्रस्ट के सचिव, डॉ. विजय यादव ने एक बड़ी सी गौरैया की प्रतिकृति (कटआउट) के साथ पूरे उत्साह से भाग लिया। जुलूस में सैकड़ों स्कूली बच्चों, युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों ने हाथों में तख्तियां और बैनर लेकर शिरकत की, जिन पर गौरैया संरक्षण के संदेश लिखे थे। बच्चों के उत्साह ने इस आयोजन को एक जन-आंदोलन का रूप दे दिया।

सभा को संबोधित करते हुए डॉ. विजय यादव ने अत्यंत भावुक शब्दों में गौरैया के महत्त्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, "गौरैया केवल एक छोटी सी चिड़िया नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन और प्रकृति का एक अटूट हिस्सा है। इसकी मधुर चहचहाहट और फुदक-फुदक कर चलना हमारे घर-आंगन को जीवंत बना देता था। आज, शहरीकरण, कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग, और टावरों के रेडिएशन ने इसके अस्तित्व पर गहरा संकट ला खड़ा किया है।"

डॉ. यादव ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि हमने आज भी इस प्रजाति को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियां इसे केवल इतिहास के पन्नों में या तस्वीरों में ही देख पाएंगी।

डॉ. विजय की संरक्षण की सरल सलाह:

इस गंभीर चुनौती का सामना करने के लिए, डॉ. विजय यादव ने ग्रामीणों को संरक्षण के लिए बहुत ही सरल, व्यावहारिक और प्रभावी तरीके सुझाए, जिन्हें हर व्यक्ति अपने घर पर अपना सकता है:

  • कृत्रिम घोंसले बनाना: अपने घरों की छतों, बाल्कनियों या आस-पास के पेड़ों पर पक्षियों के रहने के लिए लकड़ी, दफ्ती, या नारियल के छिलकों से कृत्रिम घोंसले तैयार कर टांगें।
  • दाना-पानी की व्यवस्था: अपनी छतों और आंगनों में नियमित रूप से मिट्टी के बर्तनों में साफ पानी और थोड़ा अनाज (जैसे बाजरा, कनक, चावल) रखें। विशेष रूप से गर्मियों में यह अत्यंत आवश्यक है।
  • पेड़-पौधे लगाना: घरों के आस-पास अधिक से अधिक देसी और घने पेड़-पौधे लगाएं, जो गौरैया के लिए प्राकृतिक आश्रय प्रदान कर सकें।
  • रासायनिक कीटनाशकों का कम उपयोग: कृषि और बगीचों में रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर जैविक विकल्पों को प्राथमिकता दें, क्योंकि ये कीटनाशक गौरैया के भोजन (कीट-पतंगों) को नष्ट कर देते हैं।

एक छोटा सा प्रयास, प्रकृति के लिए बड़ा कदम:

डॉ. यादव ने सभा में उपस्थित सभी लोगों से एकजुट होकर इस अभियान को सफल बनाने की अपील की। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए हर जीव का होना जरूरी है। हमारा एक छोटा सा प्रयास, जैसे कि अपने घर की छत पर पानी का कटोरा रखना, इस छोटी सी चिड़िया को एक नया जीवनदान दे सकता है।

इस कार्यक्रम के दौरान, डॉ. विजय ने बच्चों को कृत्रिम घोंसले बनाने की विधि भी सिखाई और उपस्थित लोगों को 'गौरैया संरक्षण संकल्प पत्र' भी भरवाए। कार्यक्रम के अंत में, "चहकेगा आंगन, महकेगा जीवन, बचाएंगे गौरैया को हम" जैसे नारों के साथ, ग्रामीणों ने डॉ. विजय की अपील पर अपनी छतों पर पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था सुनिश्चित करने का सामूहिक संकल्प लिया।

प्रतापगढ़ के कुंडा क्षेत्र में आयोजित इस अनोखे और प्रेरणादायक कार्यक्रम ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक नई उम्मीद जगाई है।

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