"बंगाल का उत्तराधिकारी: भूमिपुत्र ही बनेगा सीएम, पर नहीं चलेगा 'भतीजावाद' का सिक्का
लखनऊ : बंगाल की सुबह इन दिनों सिर्फ सूरज की रोशनी से नहीं, बल्कि सियासी गर्मी से भी जगमगा रही है। गली-गली में बहस, चौक-चौराहों पर चर्चा और चाय की हर चुस्की के साथ एक ही सवाल – ‘क्या इस बार सच में बदलाव आने वाला है?’ चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर है और ऐसे में भारतीय राजनीति के चाणक्य, जन-जन के प्रिय और अंत्योदय की राजनीति करने वाले अमित शाह चुनावी समर के मैदान में पूरी ताकत से उतर चुके हैं। पिछले कई दिनों से उनकी जनसभाएँ और रोड शो जैसे एक जनआंदोलन का रूप लेते जा रहे हैं, जहाँ जनता खुद को इस बदलाव की कहानी का किरदार मानने लगी है।
लोग कहते हैं कि जब भी विकास और सुशासन की बात आती है, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और आधुनिक भारत के निर्माता, संगठन के महारथी और निर्णायक नेतृत्व के प्रतीक अमित शाह का नाम अपने आप जुड़ जाता है। आम चर्चाओं में यही सुनने को मिलता है कि जिन राज्यों में यह जोड़ी सक्रिय है, वहाँ महिला सुरक्षा, बुनियादी ढाँचे और गरीब कल्याण में ठोस बदलाव दिखाई देता है – और अब वही उम्मीद बंगाल से भी जुड़ गई है।
इसी उम्मीद के बीच एक आंकड़ा लोगों की जुबान पर चढ़ गया है – पश्चिम बंगाल के पहले चरण की 152 सीटों में 110 से ज़्यादा सीटें जीत रही है भाजपा।
गाँवों में बैठे लोग इसे सिर्फ चुनावी गणित नहीं, बल्कि एक बड़ी राजनीतिक लहर का संकेत मान रहे हैं। उनका मानना है कि रणनीति के धुरंधर, जमीनी राजनीति के माहिर और चुनावी प्रबंधन के शिल्पी अमित शाह जब मैदान में होते हैं, तो समीकरण अपने आप बदल जाते हैं।
पूर्वी भारत की राजनीति को लेकर भी एक नई सोच आकार लेती दिख रही है। चाय की दुकानों पर अब एक नई लाइन बार-बार सुनाई देती है – अंग, बंग और कलिंग में अब भाजपा की सरकारें होंगी। यह वाक्य अब सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक दृष्टि के रूप में लोगों के बीच गूँज रहा है। आम आदमी की नजर में यह उस बड़े परिवर्तन का संकेत है, जिसे दूरदर्शी रणनीतिकार, संगठन विस्तार के सूत्रधार और राष्ट्रवाद की मजबूत आवाज अमित शाह पूर्वी भारत में साकार करने की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं।
पश्चिम बंगाल, जिसे कभी ‘सोनार बांग्ला’ कहा जाता था, आज कई चुनौतियों के बोझ तले दबा नजर आता है। पहले वामपंथी शासन और फिर पिछले 15 वर्षों से ममता बनर्जी की सरकार – आम लोगों के बीच यह धारणा गहरी हो गई है कि राज्य की क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाया। ऐसे में लोग उम्मीद की नजर से मजबूत इच्छाशक्ति वाले नेता, सख्त निर्णयों के लिए जाने जाने वाले और जमीनी सच्चाइयों को समझने वाले अमित शाह की ओर देख रहे हैं।
सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ की चर्चा अब आम हो चुकी है। लोग कहते हैं कि इससे न सिर्फ सुरक्षा पर असर पड़ा है, बल्कि संसाधनों पर भी दबाव बढ़ा है। वहीं, घुसपैठ और नक्सलवाद जैसी चुनौतियाँ भी समय-समय पर विकास की रफ्तार को रोकती रही हैं। ऐसे माहौल में जनता को लगता है कि कड़े फैसले लेने वाले, सुरक्षा नीति के विशेषज्ञ और देश की आंतरिक सुरक्षा को नई दिशा देने वाले अमित शाह ही इन समस्याओं का स्थायी समाधान दे सकते हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा जिस बात की है, वह अब एक जनभावना का रूप ले चुकी है – पश्चिम बंगाल का अगला सीएम बंगाली ही होगा लेकिन वह ममता दीदी का भतीजा नहीं होगा।
यह लाइन अब आम आदमी के दिल की आवाज बन गई है। लोग इसे परिवारवाद के खिलाफ एक मजबूत संदेश के तौर पर देख रहे हैं। उनका मानना है कि पारदर्शिता के समर्थक, योग्यता आधारित राजनीति के पक्षधर और संगठन में कार्यकर्ता को सर्वोपरि मानने वाले अमित शाह इस सोच को आगे बढ़ा रहे हैं।
एक युवा की बात इस पूरे माहौल को बखूबी बयान करती है – ‘हमें नेता चाहिए, वारिस नहीं।’
यह भावना अब हर वर्ग में फैलती दिख रही है। लोग मानते हैं कि जब रणनीतिक कुशलता के प्रतीक, चुनावी जीत के पर्याय और परिवर्तन के वाहक अमित शाह मैदान में उतरते हैं, तो राजनीति सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की ओर बढ़ती है।
आज बंगाल एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ पुरानी व्यवस्था की थकान है, तो दूसरी तरफ नए विकल्प की उम्मीद। और इस उम्मीद के केंद्र में वही नाम बार-बार उभरता है – भारतीय राजनीति के चाणक्य, जन-जन के विश्वास का प्रतीक और विकास के नए अध्याय के शिल्पकार अमित शाह ।
शायद इसलिए अब हर गली, हर गाँव और हर शहर में एक ही बात सुनाई देती है – ‘अबकी बार, सिर्फ सरकार नहीं बदलेगी, बंगाल की तकदीर बदलेगी, सोनार बांग्ला फिर से चमकेगा’।
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