हिमाचल का यह छोटा सा गांव कैसे बना देश का गौरवशाली 'हैंडलूम विलेज'?
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में स्थित शरन गांव पारंपरिक हथकरघा कला और महिलाओं की आत्मनिर्भरता की अनूठी मिसाल पेश कर रहा है। जानिए कैसे अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और बुनाई के हुनर से यह गांव हैंडलूम विलेज बना।
कुल्लू : हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले की रूमसू पंचायत में बसा छोटा सा गांव 'शरन' आज देश-दुनिया में अपनी एक खास पहचान बना चुका है। पारंपरिक कला और आधुनिक पर्यटन का यह एक बेहतरीन संगम है। वर्ष 2020 में भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा शरन को आधिकारिक तौर पर 'हैंडलूम विलेज' घोषित किया गया था, जिसके बाद से इस गांव की सामाजिक और आर्थिक तस्वीर पूरी तरह बदल गई है।
शरन गांव की इस ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे इसकी अनूठी वास्तुकला और प्राचीन बुनाई कला का अहम योगदान रहा है। सर्वे के दौरान पाया गया कि गांव के लगभग 95% घर पारंपरिक 'काष्ठ कुणी' शैली से बने हैं। इसके साथ ही, गांव के घर-घर में पट्टू, कुल्लवी शॉल, टोपी और मफलर जैसे उत्पाद पारंपरिक खड्डियों (हथकरघा) पर बुने जाते थे।
हैंडलूम विलेज का दर्जा मिलने के बाद यहाँ वस्त्र मंत्रालय और बुनकर सेवा केंद्र के माध्यम से कई विकास कार्य किए गए। बुनकरों, विशेषकर स्थानीय महिलाओं को आधुनिक बुनाई का प्रशिक्षण दिया गया, खड्डियां प्रदान की गईं और ताना बुनाई की मशीनें उपलब्ध कराई गईं। आज गांव की लगभग 200 से अधिक महिलाएं अपने खाली समय में हथकरघा उत्पादों का निर्माण कर आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं। यहाँ के तैयार हस्तशिल्प उत्पाद विभिन्न माध्यमों से 30 से भी अधिक देशों में निर्यात किए जाते हैं।
पर्यटन और स्थानीय आर्थिकी को बढ़ावा देने के लिए गांव में तीन मंजिला बहुउद्देशीय भवन का निर्माण किया गया है, जिसका उद्घाटन मंडी सांसद कंगना रनौत ने किया था। इस परिसर में पर्यटकों के सीखने के लिए खड्डी केंद्र, एक कैफे, उत्पादों की बिक्री हेतु शोरूम और एक समृद्ध लाइब्रेरी की सुविधा है। शरन गांव न केवल प्राचीन कला शैली को जीवित रखे हुए है, बल्कि स्थानीय लोगों को आजीविका प्रदान कर महिला सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण बन गया है।
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