गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहादत वर्ष यात्रा का कानपुर में केसरी झंडों और फूलों से स्वागत

कानपुर में गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी वर्ष यात्रा का बच्चों ने केसरी झंडा लहराकर और फूलों से स्वागत किया

Jul 13, 2025 - 22:40
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गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहादत वर्ष यात्रा का कानपुर में केसरी झंडों और फूलों से स्वागत
गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहादत वर्ष यात्रा का कानपुर में केसरी झंडों और फूलों से स्वागत

कानपुर। सिख धर्म के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी वर्ष को समर्पित भव्य धार्मिक यात्रा का रविवार को कानपुर में ऐतिहासिक और श्रद्धापूर्ण स्वागत किया गया। यात्रा का शुभारंभ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास से कीर्तन समागम के साथ हुआ, जिसका संचालन अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व सदस्य सरदार परविंदर सिंह के सहयोग से किया गया।

इस पावन यात्रा में दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सचिव सरदार जगनैन सिंह नौनी, उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री बलदेव सिंह ओलख, सरदार रमिंदर सिंह रिंकू, सरदार अजीत सिंह छाबड़ा, सरदार सरबजीत सिंह कोहली, टोनी ग्रोवर और रविंद्र सिंह रोमी जैसी कई प्रमुख हस्तियों ने भाग लिया।

यात्रा जैसे-जैसे शहर में आगे बढ़ती रही, जगह-जगह फूलों की वर्षा कर श्रद्धालुओं और संगत ने उसका भव्य स्वागत किया। बच्चों ने केसरी झंडे लहराते हुए जयकारों के साथ श्रद्धा प्रकट की। “बोले सो निहाल, सत श्री अकाल” के उद्घोष से शहर गूंज उठा।

गुरुद्वारा संकट हरण दुख निवारण, सरसैया घाट और कीर्तन गढ़, गुमटी नंबर 5 पर बड़ी संख्या में संगत ने धन गुरु तेग बहादुर साहिब की गूंज के साथ यात्रा का स्वागत किया। सांसद रमेश अवस्थी, भाजपा जिलाध्यक्ष अनिल दीक्षित, सुरेश अवस्थी, और रघुनंदन भदौरिया सहित कई जनप्रतिनिधियों ने भी यात्रा में भाग लेकर श्रद्धा अर्पित की।

इस मौके पर पांच प्यारों को सरोपा भेंट कर सम्मानित किया गया। सम्मान समारोह में सरदार हरजीत सिंह कालरा, सरदार प्रतिपाल सिंह, हरमीत सिंह, और सरबजीत सिंह कोहली वीर जी विशेष रूप से उपस्थित रहे।

यह ऐतिहासिक यात्रा कानपुर से इटावा और फिर आगरा के गुरुद्वारा गुरु का ताल पहुंचेगी, जहां रात्रि विश्राम के बाद अगली सुबह दिल्ली स्थित गुरुद्वारा शीशगंज साहिब पहुंचकर गुरु तेग बहादुर जी के शहीदी स्थल के दर्शन के साथ सम्पन्न होगी।

यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि शहादत, सेवा और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक बनकर सिख परंपरा की महान विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचा रही है।

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